कूड़ा पर्वत को हटाने पर करोड़ों खर्च, लेकिन गंदगी से नहीं मिली निजात, अब फिर नई कार्ययोजना पर माथापच्ची
बरेली : शहर के बाकरगंज का इलाका पिछले 55 वर्षों से एक ऐसी त्रासदी झेल रहा है, जो अब तक खत्म होने का नाम नहीं ले रही। यहां का कचरा अब सिर्फ गंदगी नहीं, बल्कि एक कूड़ा पर्वत बन चुका है। इसकी ऊंचाई हर गुजरते दिन के साथ बढ़ती जा रही है। नगर निगम के पर्यावरण विभाग के मुताबिक यहां करीब 18 लाख मीट्रिक टन कचरा जमा हो चुका है, जो एक छोटे पहाड़ के बराबर है।
योजनाएं आईं, पैसा बहा, मगर कूड़ा टस से मस नहीं…
नगर निगम ने अब तक करीब 2 करोड़ रुपये खर्च कर दिए। कई बार सफाई की योजनाएं बनीं, डेडलाइन तय हुई, लेकिन जमीन पर कुछ नहीं बदला। मार्च 2024 तक इस कचरे को हटाने की डेडलाइन थी, जो गुजर चुकी है। हालांकि, इससे पहले भी कई बार डेडलाइन दी गई थी। मगर, अब मई 2025 की नई समयसीमा तय की गई है। इसमें तीन एजेंसियों को मिलकर काम करने की जिम्मेदारी दी गई है
निस्तारण की क्षमता 1700 टन, लेकिन हो रहा केवल 1000 टन का काम
शहर के पास हर दिन 1700 मीट्रिक टन कचरा निस्तारण की क्षमता है, लेकिन वास्तव में केवल 1000 टन कचरे का ही निपटान हो रहा है। बाकी के 700 टन हर दिन पुराने कूड़े के ढेर को और ऊंचा कर रहे हैं, जिससे बाकरगंज की स्थिति बद से बदतर हो रही है।
स्थानीय लोगों की पीड़ा: आश्वासन ही मिले, समाधान नहीं
स्थानीय निवासी रेहान खान बताते हैं, “हर साल कोई न कोई अधिकारी, कोई न कोई योजना आती है, लेकिन परिणाम सिफर। बदबू, मच्छर और बीमारियों के बीच रहना हमारी मजबूरी बन गई है।”लोगों का आरोप है कि स्मार्ट सिटी मिशन के नाम पर करोड़ों खर्च हुए, लेकिन बाकरगंज की तस्वीर नहीं बदली।
प्रशासन ने तैयार की नई रणनीति, पर्यावरण विभाग कर रहा समीक्षा
जिलाधिकारी रविन्द्र कुमार ने नगर निगम को निर्देश दिए हैं कि एक सप्ताह के भीतर नई कार्ययोजना तैयार की जाए। नगर स्वास्थ्य अधिकारी डॉक्टर भानु प्रकाश ने बताया कि अब तीन एजेंसियां एक साथ काम करेंगी। जिससे समस्या को जल्द सुलझाने की उम्मीद है।
वहीं, पर्यावरण विभाग भी इस पर विचार कर रहा है कि किस तरह से कचरे के प्रबंधन में तकनीकी व रणनीतिक बदलाव लाया जा सके।
“मंथन अमृत लाएगा या विष उगलेगा?”
अब बड़ा सवाल यही है कि क्या यह नई योजना बाकरगंज को 55 साल पुरानी गंदगी की कैद से आजादी दिला पाएगी? या फिर यह भी पहले की तरह कागजों और बैठकों तक ही सीमित रह जाएगी?
फिलहाल बाकरगंज के लोग उम्मीद और बदबू के बीच फंसे, स्वच्छता के उस दिन का इंतजार कर रहे हैं जब उन्हें अपने मोहल्ले में सांस लेने के लिए नाक बंद नहीं करनी पड़ेगी।
