लखनऊ : उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव और उससे पहले 2026 के पंचायत चुनाव को लेकर सियासी हलचल तेज है। ऐसे में एनडीए की सहयोगी पार्टी अपना दल (एस) ने एक बड़ा सियासी दांव चलकर जाटव समाज के वरिष्ठ नेता आरपी गौतम को उत्तर प्रदेश का नया प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया है। इस फैसले को दलित मतदाताओं को साधने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।
राजकुमार पाल की जगह संभाली कमान

मई की शुरुआत में अपना दल (एस) के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष राजकुमार पाल ने पार्टी और पद से इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने पार्टी नेतृत्व पर विचारधारा से भटकने और उपेक्षा का आरोप लगाया था, तब से प्रदेश अध्यक्ष का पद खाली चल रहा था। 29 मई को पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की संस्तुति और अनुप्रिया पटेल की मंजूरी के बाद आरपी गौतम के नाम पर मुहर लगी।
कौन हैं आरपी गौतम?
जाटव समुदाय से ताल्लुक रखने वाले आरपी गौतम पार्टी के पुराने और वफादार नेताओं में गिने जाते हैं। वे अभी तक पार्टी के सहकारिता मंच के प्रदेश अध्यक्ष पद पर कार्यरत थे। पार्टी के संगठन में नीतिगत मजबूती और सामाजिक समरसता के लिए उन्होंने जमीनी स्तर पर लगातार काम किया है।
एससी कार्ड, पंचायत से लेकर विधानसभा तक
आरपी गौतम की नियुक्ति के पीछे साफ सियासी संकेत हैं। उत्तर प्रदेश में जाटव समुदाय की बड़ी संख्या है, जो पारंपरिक रूप से बसपा का कोर वोट बैंक रहा है। लेकिन मौजूदा सियासी समीकरणों में यह तबका अब विकल्पों की तलाश में है। अपना दल (एस) ने आरपी गौतम को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर यह संकेत देने की कोशिश की है कि वह दलित समाज खासकर जाटव वोटरों को अपनी तरफ खींचना चाहती है।
पंचायत चुनाव, पहला इम्तिहान
आरपी गौतम के सामने सबसे बड़ी चुनौती 2026 के पंचायत चुनाव में पार्टी को मज़बूती से खड़ा करना है।
पार्टी ने पहले ही संकेत दे दिया है कि वह अकेले चुनावी मैदान में उतरेगी। पंचायत चुनाव को 2027 विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल माना जा रहा है, ऐसे में गौतम के नेतृत्व की परीक्षा जल्द ही होने वाली है।
पार्टी में खुशी, जाटव समाज में उम्मीद
पार्टी नेता संजीव सिंह राठौर ने कहा कि “आरपी गौतम समाज से जुड़े हुए जमीनी नेता हैं। उन्होंने संगठन को मजबूत करने में बड़ी भूमिका निभाई है। उनका अध्यक्ष बनना दलित समाज को सशक्त बनाने की दिशा में बड़ा कदम है।”
क्यों अहम है यह नियुक्ति?
बसपा के कमजोर होते जनाधार के बीच दलित वोटर्स का नया सियासी ठिकाना बनने की होड़ में अपना दल (एस) ने बड़ी चाल चली है। एनडीए की सहयोगी होने के नाते,भाजपा के लिए भी यह संदेश है कि दलितों को जोड़ने की राजनीति अब सिर्फ जाति नहीं, नेतृत्व पर केंद्रित होगी। इससे अनुप्रिया पटेल की पार्टी को एक स्वतंत्र पहचान और एससी समाज में मजबूत पकड़ मिल सकती है।
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