इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेकर शुरू की जनहित याचिका के रूप में सुनवाई, स्लीपर बसों में सुरक्षा मानकों और आपातकालीन व्यवस्था पर उठाए सवाल
प्रयागराज: यमुना एक्सप्रेसवे पर ग्रेटर नोएडा के पास स्लीपर बस में आग लगने से नौ यात्रियों की मौत की घटना पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया है। न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की पीठ ने मामले की जनहित याचिका के रूप में सुनवाई शुरू की। कोर्ट ने प्रदेश के मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक और अपर मुख्य सचिव परिवहन को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश होने का निर्देश दिया है। हाईकोर्ट ने स्लीपर बसों के संचालन और उनमें लागू सुरक्षा मानकों को लेकर गंभीर चिंता जताई है।
बिना उचित जांच चल रही स्लीपर बसों पर कोर्ट चिंतित
कोर्ट ने समाचार पत्रों में प्रकाशित खबरों के आधार पर स्वतः संज्ञान लेते हुए कहा कि प्रदेश में एसी स्लीपर बसें उचित जांच और पर्याप्त सुरक्षा उपायों के बिना संचालित किए जाने की शिकायतें सामने आ रही हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि बस चालकों और परिचालकों को आपातकालीन परिस्थितियों से निपटने के लिए पर्याप्त प्रशिक्षण दिया जाना जरूरी है। दुर्घटना की स्थिति में यात्रियों को सुरक्षित बाहर निकालने की व्यवस्था भी सुरक्षा मानकों का अहम हिस्सा है।
देश में बसों में आग की 45 घटनाओं का हवाला
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने राज्यसभा में केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री की ओर से पेश किए गए आंकड़ों का भी उल्लेख किया। कोर्ट के अनुसार, जनवरी 2023 से 10 दिसंबर 2025 के बीच देश में बसों में आग लगने की करीब 45 घटनाएं हुईं। इन घटनाओं में 64 यात्रियों की मौत और 145 यात्रियों के घायल होने की जानकारी दी गई। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में पिछले तीन वर्षों के दौरान रायबरेली-लखनऊ हाईवे, कन्नौज-आगरा एक्सप्रेसवे और मथुरा-ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेसवे पर हुए बड़े बस हादसों का भी उल्लेख किया।
स्लीपर बसों में इन सुरक्षा मानकों का पालन जरूरी
कोर्ट ने रिसर्च टीम और एमिकस क्यूरी की ओर से सामने रखी गई जानकारी का हवाला देते हुए कहा कि बसों में ऑटोमोटिव इंडस्ट्री स्टैंडर्ड का पालन अनिवार्य है। इन मानकों के तहत ड्राइवर पार्टीशन पर रोक, वाहन की अधिकतम ऊंचाई 3.8 मीटर और बस की लंबाई के अनुसार पर्याप्त आपातकालीन द्वार की व्यवस्था शामिल है। 12 मीटर से छोटी बस में कम से कम चार और 12 मीटर से बड़ी बस में कम से कम पांच आपातकालीन द्वार होने की बात कही गई है। इसके अलावा यात्रियों के सुरक्षित आवागमन के लिए निर्धारित गैंगवे मानकों का पालन भी जरूरी है।
आग से बचाव के लिए आधुनिक उपकरण जरूरी
कोर्ट के समक्ष रखे गए सुरक्षा मानकों के अनुसार इंजन बे में स्वचालित एरोसोल या फोम प्रणाली, यात्री केबिन में कम दबाव वाली वाटर मिस्ट प्रणाली और चालक के लिए नींद या थकान की स्थिति का अलर्ट देने वाली प्रणाली जैसी व्यवस्थाएं भी जरूरी हैं। कोर्ट ने संकेत दिया कि सुरक्षा मानकों का पालन नहीं करने वाली बसों के मामले में केवल चालक और परिचालक की जिम्मेदारी तय करना पर्याप्त नहीं होगा।
बस ऑपरेटर के खिलाफ भी कार्रवाई के निर्देश
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि दुर्घटनाग्रस्त बस निर्धारित सुरक्षा मानकों का पालन नहीं कर रही थी तो चालक और परिचालक के साथ बस ऑपरेटर या लाइसेंसी के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए। कोर्ट ने ऐसे ऑपरेटर की अन्य बसों के संचालन पर प्रतिबंध लगाने की संभावना पर भी विचार करने को कहा है। मुख्य सचिव ने अदालत को भरोसा दिलाया कि वह मामले की व्यक्तिगत रूप से निगरानी करेंगे। इसके साथ ही रात के समय स्लीपर बसों की जांच के लिए विशेष संयुक्त जांच अभियान चलाने की बात भी कही गई।
13 अक्टूबर तक मांगा विस्तृत हलफनामा
हाईकोर्ट ने संबंधित विभागों को 13 अक्टूबर तक विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया है। इसमें पिछले तीन वर्षों के दौरान प्रदेश में स्लीपर बसों को जारी किए गए परमिट की संख्या और परमिट जारी करने से पहले सुरक्षा मानकों की जांच का ब्योरा देने को कहा गया है। इसके अलावा बसों के मूल डिजाइन में अधिक जगह बनाने या पार्सल और सामान ढोने के लिए किए गए बदलावों की जानकारी भी मांगी गई है।
सीमा पर जांच और यात्रियों से पूछताछ का भी देना होगा ब्योरा
अदालत ने अंतरराज्यीय सीमाओं पर औचक जांच की व्यवस्था, चेकिंग के दौरान यात्रियों से पूछताछ, बसों में अग्निशामक यंत्रों की उपलब्धता और आपातकालीन द्वारों की स्थिति का विवरण भी मांगा है। इसके साथ ही बस चालकों और परिचालकों को दी जाने वाली आपातकालीन प्रशिक्षण व्यवस्था की जानकारी भी हलफनामे में देने का निर्देश दिया गया है।
तीन साल में हुए बस हादसों की कार्रवाई का रिकॉर्ड मांगा
हाईकोर्ट ने पिछले तीन वर्षों में स्लीपर बसों से जुड़े हादसों में दर्ज आपराधिक मुकदमों और उनकी वर्तमान स्थिति का ब्योरा भी मांगा है। अदालत की यह कार्रवाई यमुना एक्सप्रेसवे पर स्लीपर बस में आग लगने से नौ यात्रियों की मौत की घटना के बाद बसों में सुरक्षा मानकों, परमिट व्यवस्था, जांच और आपातकालीन तैयारियों की जवाबदेही तय करने की दिशा में महत्वपूर्ण न्यायिक कार्यवाही के रूप में सामने आई है।
