लेखक
डॉ.तनु जैन
सीईओ
बरेली कैंटोनमेंट
“धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्॥”अर्थात-धर्म,अर्थ, काम और मोक्ष-जीवन के सभी पुरुषार्थों का मूल आधार स्वास्थ्य है। भारतीय दर्शन ने सदैव स्वास्थ्य को सर्वोच्च संपदा माना है, लेकिन विडंबना यह है कि जिस महिला पर परिवार और समाज का पूरा ढांचा टिका है। उसी के स्वास्थ्य को सबसे अधिक उपेक्षित किया जाता है। सुबह पांच बजे उठकर घर संभालने वाली,बच्चों का भविष्य बनाने वाली, खेत -खलिहान और रसोई के बीच अपनी जिंदगी खपा देने वाली करोड़ों भारतीय महिलाओं की कहानी लगभग एक जैसी है, वह सबका ध्यान रखती है। मगर, वह स्वयं को भूल जाती है। कमजोरी, चक्कर, एनीमिया,पीरियड्स को अनियमितता, मानसिक तनाव, प्रसवोत्तर अवसाद, इन सबको वह “सामान्य” मानकर सहती रहती है।यही सहनशीलता धीरे-धीरे एक मौन स्वास्थ्य संकट में बदल जाती है।
भारत की महिलाएं, और आंकड़ों में छिपा संकट
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के अनुसार भारत में लगभग 57% महिलाएं एनीमिया से पीड़ित हैं। यह केवल खून की कमी नहीं, बल्कि कुपोषण, थकावट,।गर्भावस्था संबंधी जटिलताओं और कमजोर पीढ़ी की चेतावनी है।मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति भी चिंताजनक है। विभिन्न शोधों के अनुसार, हर 4 में से 1 महिला जीवन के किसी न किसी चरण में अवसाद, चिंता या गंभीर मानसिक तनाव से गुजरती है, लेकिन समाज आज भी महिलाओं की मानसिक पीड़ा को “मूड स्विंग” कहकर टाल देता है।
ग्रामीण भारत में संकट और गहरा
गांवों में महिलाओं की स्थिति और अधिक गंभीर है, जहाँ अस्पताल दूर हैं, महिला डॉक्टरों की कमी है। पीरियड्स पर आज भी चुप्पी है, और गर्भावस्था तक को “सामान्य प्रक्रिया” मानकर जोखिमों को नजरअंदाज किया जाता है। अनेक ग्रामीण महिलाएं आज भी आयरन और कैल्शियम की कमी से जूझ रही हैं।
प्रसव पूर्व जांच नहीं करा पातीं
स्वच्छ सैनिटरी सुविधाओं से वंचित हैं। मानसिक स्वास्थ्य को बीमारी मानती ही नहीं, और समस्या सिर्फ संसाधनों की नहीं, सोच की भी है।महिला स्वास्थ्य की सबसे बड़ी बाधा केवल अस्पतालों की कमी नहीं, बल्कि वह सामाजिक सोच है, जो महिलाओं को बचपन से सिखाती है कि “पहले परिवार, बाद में खुद।”वह बीमार होने पर भी कहती है, “पहले बच्चों को खिला दूं…”“पहले घर का काम निपटा लूं…”इतनी भी क्या बीमारी है…”यही मानसिकता महिलाओं को उपचार से दूर रखती है।
सरकार और समाज, और दोनों की जिम्मेदारी
महिला स्वास्थ्य को सुधारने के लिए केवल योजनाएं पर्याप्त नहीं, बल्कि उनका प्रभावी क्रियान्वयन जरूरी है। उन्हें आवश्यक कदम, जैसे स्वास्थ्य जागरूकता अभियान घर-घर तक पहुंचे। पीरियड्स, मानसिक स्वास्थ्य और पोषण पर खुली चर्चा हो। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को मजबूत किया जाए, मोबाइल हेल्थ यूनिट्स ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचें। किशोरियों और गर्भवती महिलाओं को आयरन, कैल्शियम, पोषण किट उपलब्ध हों। महिला मानसिक स्वास्थ्य के लिए काउंसलिंग और हेल्पलाइन सक्रिय हों।
महिला स्वस्थ तो राष्ट्र सशक्त
भारतीय संस्कृति कहती है, “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः” अर्थात जहाँ नारी का सम्मान होता है, वहीं देवताओं का वास होता है।परंतु सम्मान केवल शब्दों से नहीं, उसके स्वास्थ्य, सुरक्षा और गरिमा की रक्षा से सिद्ध होता है।, एक स्वस्थ महिला ही,एक स्वस्थ परिवार, एक शिक्षित पीढ़ी,और एक मजबूत राष्ट्र की नींव रखती है।
