डॉ.तनु जैन
सीईओ, बरेली कैंटोनमेंट बोर्ड,
लेखक
दुनिया में कुछ प्रार्थनाएँ ऐसी होती हैं, जो किसी एक धर्म, समुदाय या परंपरा तक सीमित नहीं रहतीं,बल्कि समूची मानवता की चेतना को स्पर्श करती हैं। नवकार मंत्र ऐसी ही एक दिव्य प्रार्थना है। यह केवल जैन धर्म का पूज्य मंत्र नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, आत्मजागरण और वैश्विक समरसता का सार्वभौमिक संदेश है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यही है कि यह किसी ईश्वर, अवतार या विशेष नाम का स्मरण नहीं करता, बल्कि उन उच्चतम चेतन अवस्थाओं को नमन करता है।जिन्होंने आत्म-विजय प्राप्त कर मानवता के लिए आदर्श स्थापित किए।
नवकार मंत्र- पूजा नहीं, आत्म -विकास का आह्वान
नवकार मंत्र का मूल भाव यह नहीं कि हम किसी बाहरी सत्ता से कृपा मांगें। इसका संदेश है कि हम स्वयं को इतना निर्मल, जागरूक और अनुशासित बनाएं कि दिव्यता हमारे भीतर प्रकट हो सके। यह हमें बताता है कि धर्म का सर्वोच्च उद्देश्य किसी पंथ से जुड़ना नहीं, बल्कि स्वयं उस पथ का रूप बन जाना है जो सत्य, करुणा और संयम से निर्मित हो।
‘णमो अरिहंताणं’-भीतर के शत्रुओं पर विजय
जब हम “णमो अरिहंताणं” कहते हैं, तो हम उन महापुरुषों को नमन करते हैं जिन्होंने अपने भीतर के शत्रुओं-क्रोध, अहंकार, लोभ और मोह-पर विजय पाई। यह युद्ध बाहरी नहीं, आंतरिक है। यह हमें सिखाता है कि सबसे बड़ी वीरता स्वयं पर विजय पाना है। आधुनिक समाज में जहां बाहरी उपलब्धियों को सफलता का पैमाना माना जाता है, वहाँ यह मंत्र याद दिलाता है कि असली जीत अपने मन पर नियंत्रण है।
‘णमो सिद्धाणं’-मुक्ति का आदर्श
“णमो सिद्धाणं” उन मुक्त आत्माओं को प्रणाम है जिन्होंने सभी कर्मबंधनों से मुक्ति पा ली। यह पंक्ति केवल श्रद्धा नहीं, बल्कि आशा का संदेश है कि पूर्णता संभव है, मुक्ति संभव है, और मनुष्य अपने प्रयास से सर्वोच्च अवस्था तक पहुँच सकता है।
ज्ञान-परंपरा का सम्मान
“णमो आयरियाणं” और “णमो उवज्झायाणं” ज्ञान की उस परंपरा को नमन हैं जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी समाज को दिशा देती आई है।आचार्य और उपाध्याय केवल शिक्षक नहीं, बल्कि जीवन और सत्य के मार्गदर्शक हैं। यह हमें स्मरण कराता है कि आध्यात्मिक और नैतिक विकास अकेले नहीं होता है।उसके लिए मार्गदर्शन, अनुशासन और परंपरा की आवश्यकता होती है।
‘णमो लोए सव्व साहूणं’-समस्त साधकों को प्रणाम
इस मंत्र का अंतिम चरण इसे वास्तव में सार्वभौमिक बना देता है। “णमो लोए सव्व साहूणं”-संसार के सभी साधकों को नमन। यहाँ कोई जाति, धर्म, भाषा, पंथ या पहचान नहीं बचती। केवल एक मान्यता शेष रहती है,जो सत्य और अच्छाई की ओर अग्रसर है, वह सम्मान के योग्य है। नवकार मंत्र की यही भावना हमें यजुर्वेद की इस प्रार्थना में भी मिलती है, “विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव। यद् भद्रं तन्न आ सुव॥” अर्थात हे दिव्य शक्ति! हमारे समस्त दोषों और दुर्गुणों को दूर कर, जो शुभ और कल्याणकारी है उसे हमारे भीतर स्थापित कर। यह वैदिक वाणी और नवकार मंत्र दोनों एक ही सत्य की ओर संकेत करते हैं, सच्चा परिवर्तन भीतर से प्रारंभ होता है।
आध्यात्मिकता का वास्तविक अर्थ
आज के समय में जब धर्म अक्सर बाहरी प्रतीकों और पहचान तक सीमित कर दिया जाता है, नवकार मंत्र हमें उसकी मूल आत्मा की ओर लौटाता है। यह बताता है कि आध्यात्मिकता का सार अनुष्ठानों में नहीं, बल्कि चेतना के परिष्कार में है; पूजा में नहीं, बल्कि व्यक्तित्व के रूपांतरण में है।
आत्म-जागरण से विश्व-शांति तक
जब व्यक्ति अपने भीतर शांति, करुणा और संयम विकसित करता है, तो वही भाव उसके परिवार, समाज और अंततः विश्व तक पहुँचते हैं। यही कारण है कि आत्म-जागरण से अंतर-शांति,और अंतर-शांति से विश्व-शांति जन्म लेती है।
