हिंदू-मुसलमान हिंदुस्तान की दो आँखें, कोई एक भी बंद होगी, तो देश देख नहीं पाएगा :अब्दुल कय्यूम अंसारी
भारत के स्वतंत्रता संग्राम में कई नाम गूंजते हैं, लेकिन कुछ नायक इतिहास की भीड़ में गुम हो जाते हैं। अब्दुल कय्यूम अंसारी ऐसे ही एक साहसी और दूरदर्शी नेता थे। जिन्होंने जिन्ना के दो-राष्ट्र सिद्धांत को खुले मंच पर ललकारा और पाकिस्तान बनने का विरोध गांधी जी के सामने किया।
जब मेरठ में गांधी के सामने जिन्ना को ललकारा
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साल 1945, मेरठ में एक ऐतिहासिक बैठक बुलाई गई। इसमें गांधी जी सहित कई बड़े नेता और मुस्लिम प्रतिनिधि मौजूद थे। इसी बैठक में अब्दुल कय्यूम अंसारी ने जिन्ना के पाकिस्तान की मांग का खुला विरोध किया, और बैठक का बहिष्कार कर दिया। उस समय मुस्लिम समाज के बहुत से नेता जिन्ना से टकराने की हिम्मत नहीं जुटा पाए थे, लेकिन अंसारी ने कहा था “हम एक हैं, हमें अलग नहीं किया जा सकता।”
16 साल की उम्र में जेल
अब्दुल कय्यूम अंसारी का जन्म 1 जुलाई 1905, देहरी-ऑन-सोन, बिहार (शाहाबाद जिला) में हुआ था। उनकी शिक्षा कलकत्ता विश्वविद्यालय में हुई। मगर, जंग ए आजादी की लड़ाई में 16 साल की उम्र में ही कूद गई। जिसके चलते 16 साल की उम्र में जेल चले गए। उन्होंने अंग्रेजी स्कूल से नाम कटवाया और खुद का विद्यालय शुरू किया। इसके साथ ही मुस्लिम लीग का विरोध किया, और अपना राजनीतिक दल मोमिन कॉन्फ्रेंस (1937 में स्थापना) की। हालांकि, बाद में मोमिन कांफ्रेंस का कांग्रेस में विलय किया। उनका इंतकाल (मृत्यु)18 जनवरी 1973, को बिहार में हुई।
मोमिन आंदोलन और मुस्लिम लीग का विरोध
1930 के दशक में जब मुस्लिम लीग भारत को सांप्रदायिक आधार पर बांटने की तैयारी कर रही थी, तब अब्दुल कय्यूम अंसारी ने ‘मोमिन कॉन्फ्रेंस’ की स्थापना की। यह संगठन मुस्लिम समाज के गरीब और कारीगर तबके (मोमिन/अंसारी) का प्रतिनिधि बना और मुस्लिम लीग की सांप्रदायिक राजनीति का मजबूत विकल्प साबित हुआ। 1937 और 1946 के चुनाव में मुस्लिम लीग के खिलाफ मोमिन कॉन्फ्रेंस ने सफलता हासिल की। 1946 में बिहार विधानसभा में छह मोमिन उम्मीदवार जीतकर पहुंचे। इसके बाद स्वतंत्रता के बाद मोमिन कॉन्फ्रेंस का कांग्रेस में विलय हो गया
भारत छोड़ो और पाकिस्तान न जाओ आंदोलन
1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में उन्होंने सक्रिय भागीदारी की। 1947 में बंटवारे का तीखा विरोध किया और मुसलमानों से भारत में रहने की अपील की। वो कहा करते थे “ये मेरा वतन है, मेरा मज़हब नहीं सिखाता कि मैं इसे छोड़ दूं।”
आजादी के बाद 17 साल मंत्री
17 साल बिहार सरकार में मंत्री रहे। जेल मंत्री रहते हुए कैदियों के लिए शिक्षा की शुरुआत की। ऑल इंडिया बैकवर्ड क्लासेस कमीशन (1953) का गठन करवाया, राज्यसभा सदस्य, साहित्यकार, पत्रकार (उर्दू साप्ताहिक “अल-इस्लाह”, मासिक “मसावात” के संपादक) भी थे। अब्दुल कय्यूम अंसारी ने अपनी पूरी जिंदगी हिंदू-मुस्लिम एकता, सामाजिक न्याय और गरीब तबकों के उत्थान के लिए समर्पित की। वह बार-बार कहते थे। “मैं उस भारत के लिए लड़ रहा हूं जहाँ मजहब नहीं, इंसानियत हुकूमत करे।”
जनता के बीच जाते हुए आख़िरी सांस ली
18 जनवरी 1973 को उन्हें सूचना मिली कि उनके क्षेत्र में बांध टूट गया है और बाढ़ आ गई है। राहत पहुंचाने के लिए निकले और रास्ते में ही हृदयगति रुकने से उनका निधन हो गया। 2005 में भारत सरकार ने एक डाक टिकट जरूर जारी किया, पर अब तक भारत रत्न जैसी कोई राष्ट्रीय मान्यता नहीं मिली। बिहार के नेताओं और जनता की मांग है कि उनके नाम पर केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना हो। मगर, सुनवाई नहीं हुई।
