नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने भूमि अधिग्रहण मामलों में मुआवजे को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कर दिया है कि उचित मुआवजे की संवैधानिक गारंटी को किसी भी हालत में कम नहीं किया जा सकता और इसे वित्तीय बोझ के आधार पर नहीं आंका जा सकता।
दरअसल, यह पूरा मामला नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया यानी एनएचएआई से जुड़ा हुआ है। एनएचएआई ने सुप्रीम कोर्ट में एक समीक्षा याचिका दाखिल की थी, जिसमें 4 फरवरी 2025 को दिए गए फैसले पर पुनर्विचार की मांग की गई थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को खारिज कर दिया और अपने पहले के फैसले को बरकरार रखा।
अदालत ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि भूमि अधिग्रहण के मामलों में किसानों और भूस्वामियों को मिलने वाला मुआवजा और उस पर ब्याज उनकी संवैधानिक अधिकारों का हिस्सा है। इसलिए इसे कम करने या सीमित करने की कोई भी कोशिश कानून के खिलाफ मानी जाएगी। कोर्ट ने यह भी कहा कि मुआवजे और ब्याज का निर्धारण सरकार या किसी संस्था पर पड़ने वाले वित्तीय बोझ के आधार पर नहीं किया जा सकता।
आपको बता दें कि 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला दिया था, जिसमें कहा गया था कि राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम के तहत अधिग्रहित भूमि के मालिकों को उचित मुआवजा और ब्याज दिया जाएगा। इसी फैसले को 2025 में भी लागू रखने की बात कही गई थी। अब सुप्रीम कोर्ट ने दोबारा साफ कर दिया है कि यह फैसला पूर्वव्यापी यानी रेट्रोस्पेक्टिव तरीके से लागू रहेगा।
कोर्ट की पीठ ने यह भी कहा कि भूस्वामियों को मिलने वाला ब्याज भूमि अधिग्रहण अधिनियम के अनुसार 9 फीसदी होगा। यह दर एनएचएआई अधिनियम में तय 5 फीसदी की सीमा से अधिक है, लेकिन अदालत ने इसे ही सही और न्यायसंगत माना है। इस फैसले का सीधा फायदा उन हजारों किसानों और जमीन मालिकों को मिलेगा, जिनकी जमीन हाईवे निर्माण के लिए अधिग्रहित की गई थी।
एनएचएआई ने अपनी याचिका में दलील दी थी कि इस फैसले के कारण उस पर करीब 29,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ेगा। पहले यह राशि करीब 100 करोड़ रुपये बताई गई थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि वित्तीय देनदारी का अनुमान किसी फैसले की समीक्षा का वैध आधार नहीं हो सकता। अदालत ने साफ कहा कि न्याय और संवैधानिक अधिकारों को वित्तीय दबाव के आधार पर कमजोर नहीं किया जा सकता।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी माना कि उसके पिछले फैसलों को लेकर कुछ स्पष्टीकरण की जरूरत है, ताकि उनके दायरे और प्रभाव को सही तरीके से समझा जा सके। अदालत ने कहा कि यह निर्विवाद है कि राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम के तहत जिन भूस्वामियों की जमीन अधिग्रहित की गई है, वे उचित मुआवजे और ब्याज के हकदार हैं। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण बात और कही। अदालत ने स्पष्ट किया कि सभी भूस्वामियों के दावे एक जैसे नहीं होते। कई मामलों में लोग मुआवजा बढ़ाने के लिए अलग-अलग कानूनी उपाय अपनाते हैं। लेकिन जो दावे पहले ही अंतिम रूप से तय हो चुके हैं, उन्हें दोबारा खोलने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
कोर्ट ने कहा कि न्याय व्यवस्था में स्थिरता और निश्चितता बनाए रखना बेहद जरूरी है। इसलिए ऐसे मामलों में संतुलन बनाए रखना होगा, जहां एक तरफ भूस्वामियों के अधिकार हों और दूसरी तरफ न्यायिक प्रक्रिया की अंतिमता। आपको याद दिला दें कि 23 फरवरी को भी सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि मार्च 2018 से पहले के मामलों को दोबारा नहीं खोला जाएगा।
कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उन लाखों किसानों और जमीन मालिकों के लिए राहत भरा है, जो अपनी जमीन के बदले उचित मुआवजे का इंतजार कर रहे हैं। वहीं यह फैसला सरकारी एजेंसियों के लिए एक स्पष्ट संदेश भी है कि संवैधानिक अधिकारों के साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकता। फिलहाल इस फैसले के बाद आने वाले समय में भूमि अधिग्रहण से जुड़े मामलों में नई दिशा देखने को मिल सकती है और मुआवजे को लेकर चल रहे विवादों पर भी इसका बड़ा असर पड़ेगा।