मुहम्मद साजिद
भारत का स्वतंत्रता संग्राम असंख्य बलिदानों और अनगिनत नायकों की कहानी है। कुछ नाम इतिहास की किताबों में दर्ज हुए, तो कई योद्धा गुमनामी के अंधेरे में खो गए। उन्हीं में से एक थे यूसुफ मेहर अली, वो क्रांतिकारी जिन्होंने सिर्फ आज़ादी की लड़ाई नहीं लड़ी, बल्कि ‘भारत छोड़ो’ जैसा युगांतरकारी नारा गढ़ा, जो एक पूरे आंदोलन की पहचान बन गया। हम सभी को 8 अगस्त 1942 का वह ऐतिहासिक दिन याद है, जब बंबई के गोवालिया टैंक मैदान से महात्मा गांधी ने “करो या मरो” का आह्वान किया। लेकिन यह कम लोग जानते हैं कि ‘Quit India’ यानी ‘भारत छोड़ो’ था। यह नारा गढ़ने का श्रेय जाता है एक युवा समाजवादी नेता, बंबई के मेयर और जुझारू स्वतंत्रता सेनानी यूसुफ मेहर अली को।
ऐसे हुआ ‘भारत छोड़ो’ नारे का जन्म?
देखें वीडियो 👇🏻
https://youtu.be/q5HVM-Gcfdc?si=tfW5W7EaMvusLuqa
जी. गोपालस्वामी ने अपनी चर्चित पुस्तक ‘Gandhi and Bombay’ में शांति कुमार मोरारजी के हवाले से यह ऐतिहासिक वाक्या दर्ज किया है। गांधी जी अपने सहयोगियों के साथ आज़ादी के संघर्ष के लिए एक प्रभावी नारे की तलाश कर रहे थे। किसी ने “गेट आउट” का सुझाव दिया। किसी ने “विदड्रॉ” या “रिट्रीट” कहा। लेकिन गांधी को कोई शब्द संतोषजनक नहीं लगा। तभी यूसुफ मेहर अली ने उन्हें एक धनुष भेंट किया। जिस पर खुदा हुआ था “Quit India”। गांधी ने वह धनुष देखा और बस एक शब्द कहा “आमीन”। यही था वह क्षण जब आंदोलन को मिला उसका अमर नारा ‘भारत छोड़ो’।
आप भी जानें यूसुफ मेहर अली को
यूसुफ मेहर अली का जन्म 23 सितंबर 1903 को बंबई में एक संपन्न व्यापारी परिवार में हुआ। लेकिन यूसुफ ने पारिवारिक वैभव को त्यागकर स्वाधीनता, समाजवाद और श्रमिक संघर्षों के मार्ग को चुना। उन्होंने बॉम्बे के विल्सन कॉलेज से कानून की पढ़ाई की और 1928 में ‘साइमन कमीशन गो बैक’ का नारा देकर ब्रिटिश राज की नींव हिला दी। इतिहासकारों के अनुसार Sumit Sarkar, “Modern India” (Macmillan, 1983)), यूसुफ मेहर अली उस पीढ़ी के नेताओं में से थे, जिन्होंने महात्मा गांधी के अहिंसा दर्शन के साथ-साथ मार्क्सवादी सामाजिक न्याय की अवधारणा को भी आत्मसात किया। वे कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के संस्थापकों में से थे। इसके साथ ही नेशनल मिलिशिया, बॉम्बे यूथ लीग तथा इंडियन ट्रेड यूनियन मूवमेंट के अग्रणी थे। उन्होंने जयप्रकाश नारायण, मीनू मसानी आदि के साथ मिलकर समाजवादी आंदोलन को एक वैचारिक और सांगठनिक स्वरूप दिया।
आठ बार जेल और ब्रिटिश सत्ता की क्रूर प्रतिक्रिया
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान यूसुफ मेहर अली को आठ बार जेल भेजा गया। साइमन कमीशन के विरोध में लाहौर में लाला लाजपत राय पर लाठीचार्ज के बाद जब वे शहीद हुए, तो इसी जनाक्रोश में यूसुफ को पहली बार जेल हुई थी। 1942 में जब वे बंबई के मेयर चुने गए, तब वह यरवदा जेल में थे। यह विडंबना नहीं, एक प्रतिरोध का प्रतीक था कि आजादी की लड़ाई का एक योद्धा जेल की कोठरी से अपने शहर का निर्वाचित मेयर बना।
एक विचारक, एक समाजवादी, एक राष्ट्रनायक
यूसुफ मेहर अली की दृष्टि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं थी। वे आर्थिक समानता और सामाजिक न्याय के पैरोकार थे। उन्होंने श्रमिक वर्ग, किसानों, दलितों और वंचितों के हक़ के लिए सतत संघर्ष किया। उनकी पुस्तकें “Underground Movement”, “The Price of Liberty”, “The Challenge of Socialism” — आज भी भारत की राजनीतिक चेतना को दिशा देती हैं। ऐसे में यह सवाल मौजूं है कि यूसुफ मेहर अली का नाम हमारी पीढ़ी को क्यों नहीं पढ़ाया जाता?। क्यों पाठ्यपुस्तकों में ‘भारत छोड़ो’ के पीछे खड़े इस विचारक का नाम नहीं मिलता ?। यह सवाल केवल इतिहास की भूल नहीं है, बल्कि उस सोच पर भी प्रश्नचिन्ह है।
