लेखक
मुहम्मद साजिद
मौलाना सैयद किफ़ायत अली काफ़ी, 1857 की जंग -ए- आज़ादी के वो शहीद हैं। जिसे इतिहास ने भुला दिया। बिजनौर के एक सादात (सय्यद) ख़ानदान में जन्म लेने वाले मौलाना सैयद किफ़ायत अली काफ़ी सिर्फ़ एक आलिम-ए-दीन नहीं थे, बल्कि।हकीम, शायर, मुहद्दिस,मुफस्सिर और एक सच्चे इंकलाबी थे। उनके भीतर कलम की नर्मी भी थी,और जंग के मैदान की सख़्ती भी। उनकी तालीम मुरादाबाद, बरेली और बदायूं में हुई। यहां उन्होंने दीन, हिकमत और अदब तीनों को बराबर जज़्ब किया।उस्तादों में शेख अबू सईद रामपुरी, हकीम शेर अली और मौलवी ज़की मुरादाबादी जैसे बड़े नाम शामिल थे। उनकी किताब दीवान-ए-काफ़ी, दीवान-ए-तन्हा, नसीम-ए-जन्नत, बहार-ए-खुल्द, जज़्बा-ए-इश्क़, और चहल हदीस का तर्जुमा, आज भी उनकी इल्मी काबिलियत का सबूत हैं।
जब एक फतवे ने मुरादाबाद को हिला दिया
1857 के गदर में मुरादाबाद की जामा मस्जिद की दीवारों पर एक फतवा चस्पा हुआ। फतवा था, मौलाना काफ़ी का,जिसमें उन्होंने अंग्रेजी जुल्म व सितम के खिलाफ़ उठ खड़े होने की पुकार लगाई। यह सिर्फ़ एक बयान नहीं था। यह थी बगावत की चिंगारी।अंग्रेजी दस्तावेज़ District Gazetteer, Moradabad भी इस फतवे की तस्दीक करते हैं। यानी उनकी आवाज़ इतनी बुलंद थी कि अंग्रेज भी उसे दबा नहीं सके।
जनरल बख़्त ख़ान की फौज में शामिल- दिल्ली से बरेली तक जंग
फतवे के बाद मौलाना काफ़ी ने कलम नहीं, हथियार उठाए और जनरल बख़्त ख़ान रोहिल्ला की क्रांतिकारी फौज में शामिल हो गए। उन्होंने दिल्ली, बरेली, इलाहाबाद और मुरादाबाद के मोर्चों पर लड़ाई लड़ी। मुरादाबाद आज़ाद कराने के बाद एक तात्कालिक हुकूमत भी बनी।नवाब मजीदुद्दीन ख़ान हाकिम, मौलाना काफ़ी सदर-ए-शरीअत, अब्बास अली ख़ान तोपख़ाना इंचार्ज। यह “मुरादाबाद आज़ाद हुकूमत” इतिहास की वो दास्तान है, जिसे किताबें कम, मगर क़ौम की यादें ज़्यादा सँभालती हैं।
जब गद्दारी ने अंग्रेजों को रास्ता दिखाया
रामपुर के कुछ स्थानीय गद्दारों की मदद से अंग्रेज 21 अप्रैल 1858 को फिर मुरादाबाद पर टूट पड़े। नवाब मजीदुद्दीन शहीद हुए और कई लोग गिरफ्तार। 30 अप्रैल 1858 को मौलाना काफ़ी गिरफ्तार कर लिए गए। उन पर ब्रिटिश हुकुमत की फौज ने जुल्म किए। उन्हें पढ़कर रूह कांप उठती है। उनके जिस्म पर सुलगती इस्त्री लगाई गई। ज़ख्मों में नमक भरा गया। उनसे कहा गया कि फतवा वापस ले लो, लेकिन वे अडिग अड़े) रहे। उनका जवाब था- “गुलामी के ख़िलाफ़ खड़ा होना इबादत है, इसे छोड़ नहीं सकता।”
फांसी की सजा सुन मुस्कराए, और 22 वें रमजान को चौराहे पर लटकाया
अंग्रेजों ने मौलाना को जेहाद का फतवा देने के बाद गिरफ्तार कर लिया। सिर्फ 2 दिन में मुकदमें को सुनकर अंग्रेज जज ने फांसी की सजा सुनाई। यह सुनकर मुस्कराने लगे। उनसे अंग्रेजों ने पूछा कोई, आखिरी ख्वाहिश। इस पर उन्होंने कहा-मुरादाबाद के चौराहे पर फांसी दी जाए। इस दौरान काफी जुल्म ज्यादतियां की गई। जिस्म पर तपती प्रेस (इस्त्री) की गई। उन्होंने फांसी से पहले गुस्ल कर आंखों में सुरमा लगाया। इसके बाद कुरान शरीफ पढ़ा, फांसी के फंदे पर खड़े होने के बाद पढ़ा “कोई गुल बाकी रहेगा न चमन रह जाएगा…हश्र तक नाम-ओ-निशान-ए-पंजतन रह जाएगा।” सिर्फ रसूल अल्लाह का दिन बाकी रह जाएगा…। उन्हें 22 रमज़ान, 1274 हिजरी यानी 6 मई,1858 को मौलाना काफ़ी को मुरादाबाद के मुख्य चौराहे पर फांसी दे दी गई। उनकी शहादत से पूरा मुल्क हिल गया। अंग्रेज उनके बारे में लिखते हैं-“He was the most dangerous Maulvi-with pen and with sword.”

आला हजरत ने की कलाम की तारीफ
फाजिल-ए-बरेलवी इमाम अहमद रजा खां (आला हजरत) मौलाना किफायतुल्ला काकी के कलाम को बहुत पसंद करते थे। उन्होंने फरमाया था कि दो लोगों का कलाम पसंद है। उसमें एक अपने भाई मौलाना हसन रजा खां (मौलाना हसन मियां) और दूसरे मौलाना किफायतुल्ला काफी।मुरादाबाद जेल गेट पर आज भी एक पुराना पत्थर खड़ा है,जिस पर उनका नाम दर्ज है। एक खामोश, मगर ज़िंदा गवाह।उन्होंने कहा था कि 100 साल की गुलामी से बेहतर है, एक दिन की आजादी।
फ़ज़ले हक़ खैराबादी के बाद मौलाना की कुर्बानी
Moradabad District Gazetteer, Indian Mutiny Records (1857-58), और उर्दू तवारीख जंगे-आज़ादी में उलमा का किरदार एवं लेखक सुधीर विद्यार्थी के शोध लेख में अल्लामा फ़ज़ले हक़ खैराबादी के बाद 1857 की बौद्धिक क्रांति का सबसे मज़बूत चेहरा मौलाना किफ़ायत अली काफ़ी को बताया गया है। 1857 सिर्फ तलवार की जंग नहीं थी। यह इल्म, ईमान और इंकलाब की जंग भी थी। मौलाना काफ़ी बताते हैं कि मुल्क उस वक़्त आज़ाद होता है, जब उसके लोग ख़ुद्दारी और यक़ीन से खड़े हों। आज की नस्ल को उनकी शहादत सिर्फ़ इतिहास नहीं बताती,बल्कि यह भी सिखाती है कि, जो सच के लिए खड़ा हो जाए, उसे फांसी भी ख़ामोश नहीं कर सकती।
