जब देश गुलाम था, तब विदेश में भारत की सरकार बन चुकी थी। भारत का स्वतंत्रता संग्राम सिर्फ दिल्ली, बंबई (मुंबई) और इलाहाबाद (प्रयागराज) में नहीं लड़ा गया। इसके कुछ महत्वपूर्ण अध्याय विदेशी ज़मीन पर, निर्वासन में, बिना झंडे और बैंडबाजे के लिखे गए। 1 दिसंबर 1915, काबुल, अफगानिस्तान, यहाँ स्थापित हुई भारत की निर्वासित अंतरिम सरकार, जिसे आज इतिहास की किताबों में मुश्किल से एक पंक्ति मिलती है। इसके राष्ट्रपति थे राजा महेन्द्र प्रताप सिंह, प्रधानमंत्री मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली और गृह मंत्री मौलाना उबेदुल्लाह सिंधी। यह सरकार भारत को ब्रिटिश गुलामी से आज़ाद कराने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता और समर्थन प्राप्त करने में जुटी थी। यह बात “Inside Story of India’s Freedom Struggle” K.K. Khullar की किताब में दर्ज है।
मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली उस आंदोलन की आत्मा, जिसे इतिहास ने मौन बना दिया
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7 जुलाई 1854 को भोपाल के इतवारा मोहल्ले में जन्मे मौलाना बरकतुल्लाह, शिक्षा, विद्वता और क्रांति का संगम थे। उन्हें 8 भाषाओं का ज्ञान था, अरबी, फ़ारसी, अंग्रेज़ी, जापानी, जर्मन, फ्रेंच, उर्दू और हिंदी। उन्होंने टोक्यो यूनिवर्सिटी में अरबी पढ़ाई और लिवरपूल यूनिवर्सिटी में अध्यापन किया। जर्मनी, तुर्की, रूस और जापान में उन्होंने ब्रिटिश विरोधी गठबंधन खड़ा किया। वे ग़दर पार्टी के संस्थापक सदस्यों में थे और “ग़दर” अख़बार के ज़रिए क्रांतिकारी विचारों का प्रचार करते थे।
क्या इसलिए भुला दिए गए, क्योंकि कांग्रेस के नहीं थे?
भारत की आज़ादी के बाद का इतिहास कांग्रेस-केंद्रित रहा, जो नेता गांधी और नेहरू की धारा से बाहर थे, वे इतिहास के हाशिये पर चले गए। बरकतुल्लाह भोपाली ने कभी कांग्रेस की सदस्यता नहीं ली। अहिंसा की जगह अंतरराष्ट्रीय राजनयिक संघर्ष और सशस्त्र विद्रोह को प्राथमिकता दी। विदेशी धरती पर क्रांति की मशाल जलाई और शायद यही कारण रहा कि उन्हें “गैर-सरकारी क्रांतिकारी” मानकर भुला दिया गया।
1980 में उनके नाम से यूनिवर्सिटी बनी, लेकिन सम्मान नहीं मिला
1980 में तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने भोपाल यूनिवर्सिटी का नाम बदलकर “बरकतुल्लाह यूनिवर्सिटी” किया। लेकिन इसके बाद न कोई राष्ट्रीय सम्मान, न कोई सड़क, रेलवे स्टेशन या स्मारक, न उनकी जयंती या पुण्यतिथि पर सरकारी श्रद्धांजलि। क्या यह उस प्रधानमंत्री के साथ न्याय है, जिसने भारत की पहली अंतरराष्ट्रीय सरकार चलाई?
अंतिम सांस अमेरिका में और एक अधूरा वादा
20 सितंबर 1927, सैन फ्रांसिस्को (अमेरिका) में मौलाना ने अंतिम शब्द कहे। बोले,“मैं अपने वतन की किस्मत बहादुरों को सौंपकर जा रहा हूं…”उन्हें अमेरिका के मुस्लिम कब्रिस्तान में दफनाया गया। इस वादे के साथ कि जब भारत आज़ाद होगा, तो उनकी मिट्टी वतन लाई जाएगी। लेकिन आज़ादी के 78 साल बाद भी, वह वादा अधूरा है। “मैं अपनी मातृभूमि को स्वतंत्र नहीं देख सका, पर मुझे यक़ीन है कि मेरे जैसे लाखों इसे आज़ाद कराएंगे। यह अंतिम शब्द 1927 में ”मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली के थे। इतिहासकारों ने समय-समय पर मौलाना बरकतुल्लाह को भारत रत्न जैसे सम्मान से नवाज़ने की मांग की। उनकी पुण्यतिथि पर हर साल राजकीय श्रद्धांजलि दी जाए? उन्हें इतिहास की मुख्यधारा में लाया जाए?। उनके नाम पर एक राष्ट्रीय स्मारक बने। मगर, यह सभी मांग उम्मीद बनकर रह गई हैं।
