नई दिल्ली/लखनऊ : भारतीय रुपये में भारी गिरावट का सिलसिला जारी है। गुरुवार यानी 11 सितंबर को रुपये ने अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड 88.37 का निचला स्तर छू लिया। अंतरराष्ट्रीय बाजार में मची उथल-पुथल, व्यापारिक अनिश्चितताओं और अमेरिका द्वारा लगाए जा रहे टैरिफ दबाव ने भारतीय मुद्रा पर दबाव बढ़ा दिया है।
रुपये की गिरावट के पीछे ये कारण
पिछले सप्ताह रुपये ने 88.36 का स्तर छुआ था और अब इससे भी नीचे गिरकर नया रिकॉर्ड बना दिया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति ने भारत के व्यापार और पूंजी प्रवाह पर दबाव बढ़ा दिया है। विदेशी निवेशक भारत से पैसा निकाल रहे हैं, जिससे रुपये की मांग कम हुई है।
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से गिरा रूपये
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और घरेलू शेयर बाजार में नकारात्मक रुझानों ने भी रुपये को कमजोर किया। भारत का तेल आयात लगातार बढ़ रहा है। जिससे डॉलर की मांग अधिक और रुपये पर दबाव बढ़ रहा है। निर्यात कम होने के कारण रुपये में मजबूती नहीं आ पा रही है।
आरबीआई कर रहा है डॉलर की बिक्री
बाजार की अस्थिरता रोकने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) 88.20 के आसपास रुक-रुक कर डॉलर बेच रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि रुपये का दायरा 87.80 से 88.30 के बीच रहेगा। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) जारी होने और फेड द्वारा ब्याज दरों में कटौती की उम्मीदों से भी बाजार प्रभावित हो रहा है।
विदेशी भंडार में आई गिरावट
रुपये की गिरावट रोकने के लिए आरबीआई ने विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग बढ़ा दिया है। 3 जनवरी 2025 को समाप्त सप्ताह में विदेशी मुद्रा भंडार में 5.7 बिलियन डॉलर की गिरावट दर्ज की गई। डॉलर की सप्लाई बढ़ने से भंडार पर असर पड़ा है।
डॉलर इंडेक्स और तेल बाजार
डॉलर इंडेक्स 0.05% बढ़कर 97.82 पर पहुंच गया है। वहीं, वैश्विक तेल बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड में 0.10% की गिरावट आई और यह 67.42 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा है।
आम जनता पर क्या असर होगा?
आयात महंगा होगा, जिससे पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वृद्धि हो सकती है। भारत अपने कुल तेल आयात का 80% से अधिक विदेशी स्रोतों से करता है। वित्तीय वर्ष 2023-24 में भारत ने 87.7% तेल आयात किया। महंगे आयात से महंगाई बढ़ेगी और आम नागरिक की जेब पर असर पड़ेगा।
