केंद्रीय मंत्रिमंडल का बड़ा फैसला, 12 साल बाद बढ़ी ईपीएफओ की अनिवार्य कवरेज सीमा; भविष्य निधि और पेंशन का दायरा होगा विस्तृत
नई दिल्ली: केंद्रीय मंत्रिमंडल ने कर्मचारी भविष्य निधि संगठन के तहत अनिवार्य कवरेज के लिए वेतन सीमा बढ़ाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। अब ईपीएफओ की अनिवार्य कवरेज के लिए वेतन सीमा 15,000 रुपये से बढ़ाकर 25,000 रुपये प्रति माह कर दी गई है। सरकार के इस फैसले से 51 लाख से अधिक अतिरिक्त कर्मचारी ईपीएफओ के दायरे में आ जाएंगे। सूचना और प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने प्रेस वार्ता में इस फैसले की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि ईपीएफओ की वेतन सीमा में यह बदलाव 12 साल बाद किया जा रहा है।
क्या होती है ईपीएफओ की वेतन सीमा?
ईपीएफ की वेतन सीमा का मतलब उस अधिकतम मासिक मजदूरी से है, जिसे भविष्य निधि के अनिवार्य योगदान की गणना के लिए आधार माना जाता है। वर्तमान में 15,000 रुपये प्रति माह की वैधानिक वेतन सीमा लागू थी। सामान्य स्थिति में कर्मचारी और नियोक्ता का पीएफ योगदान इसी सीमा तक निर्धारित किया जाता था। अब इस सीमा को बढ़ाकर 25,000 रुपये प्रति माह कर दिया गया है। इससे अधिक वेतन पाने वाले कर्मचारियों के लिए भी अनिवार्य कवरेज का दायरा बढ़ेगा।
12 साल बाद हुआ वेतन सीमा में बदलाव
ईपीएफओ की वेतन सीमा लंबे समय तक अपरिवर्तित रही थी। वर्ष 2004 से 2014 तक इसमें कोई बदलाव नहीं हुआ था। सितंबर 2014 में इसे बढ़ाकर 15,000 रुपये प्रति माह किया गया था। अब सरकार ने करीब 12 साल बाद इसे 25,000 रुपये करने का फैसला लिया है। सरकार के अनुसार, यह बदलाव देश में लगातार बढ़ते वेतन, आय में वृद्धि और औपचारिक रोजगार के विस्तार को ध्यान में रखते हुए किया गया है।
51 लाख से अधिक अतिरिक्त कर्मचारियों को मिलेगा लाभ
इस फैसले से 51 लाख से अधिक अतिरिक्त कर्मचारी ईपीएफओ के अनिवार्य कवरेज में शामिल होंगे। पहले 15,000 रुपये से अधिक मासिक वेतन पाने वाले कई कर्मचारी अनिवार्य कवरेज की सीमा से बाहर थे। अब 25,000 रुपये तक मासिक वेतन पाने वाले पात्र कर्मचारियों को ईपीएफओ के दायरे में लाया जाएगा। इससे उन्हें भविष्य निधि और पेंशन से जुड़ी सामाजिक सुरक्षा का लाभ मिलने का रास्ता मजबूत होगा।
20 हजार रुपये बेसिक वेतन वाले कर्मचारी को ऐसे समझें
मान लीजिए किसी कर्मचारी का मूल वेतन और महंगाई भत्ता मिलाकर 20,000 रुपये है। पुरानी 15,000 रुपये की वेतन सीमा के आधार पर पीएफ योगदान की गणना इस तरह होती थी—
- पीएफ के लिए वेतन सीमा — 15,000 रुपये
- कर्मचारी का योगदान — 15,000 का 12 प्रतिशत यानी 1,800 रुपये
- नियोक्ता का कुल योगदान — सामान्यतः 1,800 रुपये
- नियोक्ता के हिस्से में से सामान्यतः 8.33 प्रतिशत यानी करीब 1,250 रुपये पेंशन योजना में जाते हैं
- बाकी करीब 550 रुपये भविष्य निधि में जाते हैं
ईपीएफओ के अनुसार, कर्मचारी से पेंशन योजना के लिए अलग से योगदान नहीं लिया जाता। अब वेतन सीमा बढ़ाकर 25,000 रुपये किए जाने से पात्र कर्मचारियों के लिए ईपीएफओ कवरेज का दायरा बढ़ेगा।
सरकार पर बढ़ेगा वित्तीय भार
वेतन सीमा बढ़ाने के फैसले से सरकार पर भी अतिरिक्त वित्तीय भार पड़ेगा। मौजूदा वार्षिक बजट सहायता करीब 10,250 करोड़ रुपये बताई गई है। अनुमान के मुताबिक, संशोधित व्यवस्था के बाद वार्षिक सरकारी खर्च करीब 11,339 करोड़ रुपये हो सकता है। यानी सरकार को हर साल लगभग 1,089 करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च करने पड़ सकते हैं। अगले पांच वर्षों में अनुमानित कुल व्यय करीब 56,696 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है।
सामाजिक सुरक्षा का दायरा बढ़ाने पर जोर
सरकार का कहना है कि वेतन सीमा बढ़ाने का उद्देश्य अधिक से अधिक श्रमिकों को संगठित क्षेत्र की सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था से जोड़ना है। पिछले वर्षों में वेतन और औपचारिक रोजगार में हुए विस्तार को देखते हुए यह बदलाव किया गया है। नई सीमा लागू होने के बाद लाखों अतिरिक्त कर्मचारियों को भविष्य निधि और पेंशन जैसी सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था का लाभ मिल सकेगा। सरकार के मुताबिक, इससे श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा कवच और मजबूत होगा।
