डॉ.सुनीलम
भारतीय राजनीति में कुछ नाम केवल पदों से नहीं, बल्कि अपने विचारों, संघर्ष और व्यक्तित्व से अमर हो जाते हैं। चंद्रशेखर उन्हीं विरल नेताओं में से एक थे। जिन्हें देश “अध्यक्ष जी” के नाम से जानता और याद करता है। यह व्यक्तित्व केवल एक प्रधानमंत्री का नहीं, बल्कि एक ऐसे जननेता का है।जिसने सत्ता से ज्यादा संगठन, संघर्ष और सिद्धांतों को महत्व दिया।चंद्रशेखर की ऐतिहासिक पदयात्रा केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं थी, बल्कि यह जनता से सीधे संवाद का माध्यम थी। करीब 3700 किलोमीटर की इस यात्रा ने देश को यह संदेश दिया कि असली राजनीति दिल्ली की गलियों में नहीं, बल्कि गांव-गांव की धूल भरी पगडंडियों में बसती है। उनकी सोच स्पष्ट थी कि रोटी, कपड़ा, मकान, पढ़ाई और दवाई के बिना विकास का कोई भी मॉडल अधूरा है।
लोकतंत्र के थे सच्चे प्रहरी
चंद्रशेखर का लोकतांत्रिक चरित्र उनके हर निर्णय में झलकता था। संगठन में असहमति को उन्होंने कभी दबाया नहीं, बल्कि उसे लोकतंत्र की ताकत माना। यही वजह थी कि वे अपने कार्यकर्ताओं के बीच बेहद लोकप्रिय और सम्मानित रहे। यह वही दौर था जब उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को खुलकर चुनौती दी और “युवा तुर्क” के रूप में पहचान बनाई।
हर एक कार्यकर्ता के नेता
उनकी सबसे बड़ी ताकत उनका कार्यकर्ताओं से जुड़ाव था। आर्थिक मदद हो या व्यक्तिगत संबंध चंद्रशेखर हमेशा अपने साथियों के साथ खड़े नजर आए। राजनीति में जहां दूरी बढ़ती जा रही है, वहां उनका यह मानवीय चेहरा आज भी एक मिसाल है।
सिद्धांतों से नहीं किया समझौता
1977 में सत्ता का अवसर होने के बावजूद मंत्री पद ठुकराना हो या बाद में प्रधानमंत्री बनने का निर्णय, हर मोड़ पर उनके फैसले बहस का विषय रहे, लेकिन एक बात साफ थी, वे अपने सिद्धांतों के प्रति हमेशा ईमानदार रहे। हालांकि, कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाना उनके राजनीतिक जीवन का सबसे विवादास्पद फैसला माना जाता है, लेकिन उस दौर की परिस्थितियों में उन्होंने इसे देशहित में उठाया कदम बताया।
अंतरराष्ट्रीय छवि और सामाजिक सोच
नेपाल जैसे पड़ोसी देशों में भी उनकी लोकप्रियता इस बात का प्रमाण है कि वे केवल भारतीय राजनीति तक सीमित नेता नहीं थे।विश्व व्यापार संगठन और नई आर्थिक नीतियों पर उनकी बेबाक राय उन्हें एक दूरदर्शी चिंतक के रूप में स्थापित करती है।
इंसानियत की रहे मिसाल
1984 के दंगों के दौरान सिखों को बचाने के लिए अपनी जान जोखिम में डालना, उनके व्यक्तित्व के उस मानवीय पक्ष को दर्शाता है, जो आज की राजनीति में दुर्लभ होता जा रहा है। मगर, आज जब राजनीति में विचारधारा से ज्यादा समीकरण हावी होते दिखते हैं, तब चंद्रशेखर जैसे नेताओं की याद और भी प्रासंगिक हो जाती है। वे केवल एक राजनेता नहीं थे, वे एक विचार थे, एक संघर्ष थे, और एक ऐसी परंपरा थे, जिसमें राजनीति सेवा का माध्यम थी, न कि सत्ता का साधन।जन्मशताब्दी के इस अवसर पर “अध्यक्ष जी” को नमन, क्योंकि सच में, उनके जैसा कोई नहीं।
