बेगम हजरत महल की यौम-ए- पैदाइश (जन्म) 1820 में फैजाबाद (उत्तर प्रदेश) के एक ग़रीब सैयद परिवार में हुआ। बचपन में इनका नाम मुहम्मदी खानम था। 12 साल की उम्र में माता-पिता दोनों को खोने के बाद, उन्हें उनकी चाची ने एक तवायफ मोहल्ले में बेच दिया। वहाँ अम्मन और इमामन जैसी अनुभवी महिलाओं ने उन्हें संगीत, फारसी, और शाही अदब में प्रशिक्षित किया।
नवाब की ‘महक परी’ से बनी इफ्तिखार-उन-निशा
23 वर्ष की आयु में उनकी एंट्री नवाब वाजिद अली शाह के ‘परीखाना’ (शाही हरम) में हुई। नवाब ने पहले उनका नाम ‘महक परी’ रखा, और इसके बाद मुता निकाह कर ‘इफ्तिखार-उन-निशा’ की उपाधि दी। यहीं से उन्होंने बनना शुरू किया बेगम हजरत महल, एक नाम जिसे आने वाले सालों में अंग्रेज़ भी भय से याद करेंगे।
भारत की पहली महिला सेनापति जिनसे अंग्रेज़ कांप उठे
1856 में जब ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने अवध पर कब्जा किया, और नवाब को कलकत्ता निर्वासित किया गया, तो बेगम ने अपने नाबालिग पुत्र बिरजिस कद्र को अवध का नवाब घोषित किया और स्वयं अवध की रीजेंट बनीं। 1857 की क्रांति में उन्होंने विद्रोही सैनिकों का नेतृत्व किया। चिनहट की लड़ाई में अंग्रेजी फौज को मात दी। सर लॉरेंस की सेना को पीछे हटना पड़ा।
महिलाओं की सैन्य टुकड़ी बनाकर लड़ी अंग्रेज़ों से जंग
बेगम ने महिलाओं की एक सशक्त सैन्य टुकड़ी तैयार की, और युद्धक्षेत्र में स्वयं अग्रिम पंक्ति में रहीं। रानी लक्ष्मीबाई, नाना साहेब और तांत्या टोपे जैसे क्रांतिकारियों से उन्होंने रणनीतिक सहयोग लिया।
नेपाल में निर्वासन और वीरगति
1858 में जब अंग्रेज़ों ने अवध दोबारा कब्ज़ाया, तो बेगम को नेपाल में शरण लेनी पड़ी। नेपाल के राजा राणा जंग बहादुर ने उन्हें सम्मान सहित स्थान दिया। 1879 में उन्होंने वहीं अंतिम सांस ली। उनका मकबरा काठमांडू की जामा मस्जिद में स्थित है।
इतिहास में नहीं मिली पहचान
इतिहास में पुरुष सेनानियों की चर्चा भरपूर होती है, लेकिन बेगम हजरत महल जैसी वीरांगनाएं अक्सर उपेक्षित रह जाती हैं। सुदीप्ता मित्रा की पुस्तक “A Nawab and A Begum” उनके जीवन के कई अनकहे पहलुओं पर प्रकाश डालती है। हमारे स्वतंत्रता संग्राम की किताबें अगर बिना बेगम हजरत महल के पढ़ी जाएं, तो इतिहास अधूरा ही नहीं, अन्यायपूर्ण भी है।”
