15 फरवरी 1975: जब रुहेलखंड को मिला अपना विश्वविद्यालय
बरेली: रुहेलखंड क्षेत्र के लिए 15 फरवरी 1975 केवल एक तारीख नहीं, बल्कि उच्च शिक्षा के संघर्ष की ऐतिहासिक जीत है। इसी दिन महात्मा ज्योतिबा फुले रुहेलखंड विश्वविद्यालय की स्थापना हुई और दशकों से चली आ रही मांग को ठोस रूप मिला। इससे पहले यहां के कॉलेज कभी कलकत्ता तो कभी आगरा विश्वविद्यालय से संबद्ध रहे, जिससे छात्रों को परीक्षाओं, परिणामों और प्रशासनिक कार्यों में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता था।
छात्र आंदोलन से बनी नींव
1971 से रुहेलखंड में अलग विश्वविद्यालय की मांग तेज होने लगी थी। छात्र संगठनों और शिक्षकों ने मिलकर इस आंदोलन को धार दी। बरेली कॉलेज के रक्षा अध्ययन विभाग के शिक्षक चौधरी नरेंद्र सिंह इस संघर्ष की प्रमुख आवाज बने, जिन्होंने न सिर्फ आंदोलन को दिशा दी बल्कि अंतिम परिणाम तक पहुंचाया। छात्रों का यह आंदोलन धीरे-धीरे राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया।
1974 की घटना जिसने बदल दी दिशा
14 मई 1974 को तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा के बरेली आगमन के दौरान छात्रों ने अपनी मांग को निर्णायक रूप से सामने रखा। नावल्टी चौराहे से जीआईसी मैदान तक छात्रों की भारी भीड़ ने मुख्यमंत्री का रास्ता रोका। हालात तनावपूर्ण हुए, लाठीचार्ज और गिरफ्तारी तक नौबत पहुंची। करीब एक महीने तक चला यह संघर्ष सरकार तक स्पष्ट संदेश पहुंचाने में सफल रहा। छात्रों के आंदोलन और बढ़ते दबाव का नतीजा यह रहा कि 15 फरवरी 1974 को सरकार ने रुहेलखंड, बुंदेलखंड और गोरखपुर में विश्वविद्यालय स्थापित करने की घोषणा की। इसके एक साल बाद 15 फरवरी 1975 को रुहेलखंड विश्वविद्यालय औपचारिक रूप से अस्तित्व में आया।
पहला कुलपति और शुरुआती संघर्ष
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के डॉ. आनंद शरण रतूड़ी को पहला कुलपति नियुक्त किया गया। शुरुआती वर्षों में विश्वविद्यालय का कोई स्थायी भवन नहीं था। स्टेशन रोड, कचहरी क्षेत्र और कैंट के फूलबाग इलाके में अस्थायी दफ्तरों से काम चलता रहा। दस वर्षों के लंबे इंतजार के बाद 15 फरवरी 1985 को विश्वविद्यालय को अपना स्थायी परिसर मिला। शुरुआत में गिने-चुने स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों के साथ शुरू हुआ विश्वविद्यालय समय के साथ विस्तार करता गया। 1990 के दशक में इंजीनियरिंग, विधि, प्रबंधन और होटल मैनेजमेंट जैसे पाठ्यक्रम जुड़े। आज विश्वविद्यालय में 55 से अधिक कोर्स संचालित हो रहे हैं और यह क्षेत्रीय शिक्षा का बड़ा केंद्र बन चुका है।
NAAC A+ और वैश्विक पहचान
51 वर्षों की यात्रा में रुहेलखंड विश्वविद्यालय ने नैक मूल्यांकन में A+ श्रेणी हासिल की। कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में इसकी उपस्थिति ने इसे केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर का संस्थान बना दिया है।
शासन व्यवस्था और विवाद
विश्वविद्यालय की सीनेट व्यवस्था पहले चुनी हुई होती थी, लेकिन बाद के वर्षों में चुनाव प्रक्रिया बंद हो गई। 1998 के दीक्षांत समारोह को लेकर तत्कालीन कुलपति और राजनीतिक नेतृत्व के बीच खींचतान भी चर्चा में रही, जिसके चलते दीक्षांत समारोह रद्द करना पड़ा।
पूर्व छात्रों की उपलब्धियां बनी पहचान
इस विश्वविद्यालय से पढ़े छात्रों ने देश-दुनिया में नाम रोशन किया है। खेल, सिनेमा,प्रशासन,न्यायपालिका, उद्योग और शिक्षा जगत में यहां के पूर्व छात्र अहम पदों पर हैं। यही वजह है कि रुहेलखंड विश्वविद्यालय को आज केवल एक शैक्षणिक संस्थान नहीं, बल्कि संघर्ष, समर्पण और सफलता की मिसाल के रूप में देखा जाता है।
51 साल बाद भी जिंदा है संघर्ष की याद
पूर्व छात्रों का मानना है कि विश्वविद्यालय की असली ताकत उसकी संघर्षपूर्ण नींव है। आज जब यह संस्थान अपनी 51वीं वर्षगांठ मना रहा है, तो यह सिर्फ उत्सव नहीं, बल्कि उन छात्रों और शिक्षकों को याद करने का अवसर भी है, जिनके साहस और एकजुटता से रुहेलखंड को अपनी पहचान मिली।
