बरेली : जिले की विशेष न्यायाधीश (भ्रष्टाचार निवारण) अदालत ने एक दशक पुराने हत्या के मामले में बुधवार को महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। विशेष न्यायाधीश (भ्रष्टाचार निवारण) तबरेज अहमद ने बुधवार को महत्वपूर्ण फैसले में आरोपी नन्हे, रामकेश और उनके पिता रामपाल को आजीवन कारावास (Life Imprisonment) की सजा सुनाई है। यह हत्याकांड वर्ष 2014 में थाना फरीदपुर के गांव कुईया खेड़ा में हुआ था। जिसके चलते फरीदपुर कोतवाली में अपराध संख्या 104/2014 के तहत धारा 147, 148, 149, 307, 302/149 आईपीसी के तहत मुकदमा दर्ज था।
लाइसेंसी बंदूक से गोली मारकर ले ली जान
वादी बबलू ने बताया कि 16 मार्च 2014 की शाम लगभग 6:30 बजे तहेरे भाई अवनीश और ताऊ ओमकार के साथ बैठा था। इसी दौरान नन्हे, रामकेश और रामपाल समेत अन्य लोग पहुंचे। इसमें नन्हें के हाथ में एक नाली लाइसेंसी बंदूक थी, तो वहीं बाकी सबके हाथ में अवैध तमंचे थे। इन लोगों ने अवनीश पर हमला किया। नन्हें ने बंदूक से गोली मार दी। जिसके चलते गंभीर हालत में अवनीश को फरीदपुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर इलाज को भर्ती कराया। मगर, हालत गंभीर होने पर बरेली अस्पताल में रेफर किया। यहां इलाज के दौरान मौत हो गई। गवाहों के अनुसार, झगड़े के दौरान लाठी -डंडों और असलहों से लैस अभियुक्तों ने हमला किया था। जिससे गंभीर चोटों के कारण पीड़ित की मौत हो गई।
एक दिन बाद दर्ज हुआ मुकदमा
इस मामले में 17 मार्च 2014 को वादी ने घटना की सूचना लिखित तहरीर के रूप में पुलिस में दर्ज कराई गई। इसके बाद फरीदपुर थाना पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू की और सभी अभियुक्तों को गिरफ्तार किया।
अदालती प्रक्रिया और गवाहों के बयान
न्यायालय में अभियोजन पक्ष की ओर से कई गवाह पेश किए गए। जिनमें मुख्य गवाहों ने स्पष्ट किया कि आरोपियों ने मिलकर हमला किया।
बचाव पक्ष ने दलील दी कि घटना में राजनीतिक रंजिश और पारिवारिक विवाद की भूमिका थी। अदालत ने सबूतों, चिकित्सकीय रिपोर्ट और गवाहों के बयानों के आधार पर कहा कि “अभियुक्तों ने सामूहिक रूप से हमला कर एक निर्दोष व्यक्ति की जान ली। यह एक गंभीर अपराध है, लेकिन यह ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ श्रेणी में नहीं आता, इसलिए इन्हें मृत्यु दंड नहीं दिया जा सकता।” इस मामले में पीड़ित पक्ष की ओर से सहायक शासकीय अधिवक्ता सचिन जायसवाल और आरोपी की तरफ से जेड ए खान ने पैरवी की थी।
35 – 35 हजार का अर्थदंड
इसमें सुप्रीम कोर्ट के मामलों का उल्लेख कर अदालत ने कहा कि मौत की सजा केवल उन्हीं मामलों में दी जानी चाहिए जो “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” की श्रेणी में आते हैं, जबकि इस मामले में अपराध गंभीर होने के बावजूद उसमें क्रूरता या असाधारण परिस्थितियाँ नहीं पाई गईं। अदालत ने तीनों आरोपियों को धारा 302/149 आईपीसी के तहत आजीवन कारावास और 25,000 -25,000 जुर्माना अदा करने का आदेश दिया। इसके साथ ही, अन्य धाराओं में उन्हें 10 वर्ष तक की कारावास और अलग-अलग जुर्माने की सज़ा दी गई, जो साथ-साथ चलेगी। अदालत ने कहा “अभियुक्त पिछले 11 वर्ष से न्यायिक हिरासत में हैं। इस दौरान उन्होंने कोई दुराचार नहीं किया। समाज की दृष्टि से यह मामला जीवनपर्यंत कारावास योग्य है, मृत्युदंड योग्य नहीं।”
