मुहम्मद साजिद
1857 का स्वतंत्रता संग्राम देश का पहला संगठित विद्रोह था, और बरेली, जो कभी रुहेला सत्ता का गढ़ था। इस क्रांति का प्रमुख केंद्र बन गया। इसी बरेली की धड़कन में बसता है एक संस्थान बरेली कॉलेज। इसकी स्थापना 1837 में ब्रिटिश शासन ने की थी। मगर,इतिहास की विडंबना देखिए, जिस संस्थान को अंग्रेजों ने उच्च शिक्षा देने के लिए खड़ा किया था, वही क्रांति का उबाल बन गया। क्रांतिकारी छात्रों और शिक्षकों ने अंग्रेजी सत्ता को ललकारा, और इसका परिणाम हुआ कि कॉलेज के तत्कालीन अंग्रेज प्रिंसिपल डॉ. कार्लोस बक की हत्या कर दी गई। यह घटना इतिहास के उन पन्नों में दर्ज है, जिन्हें अभी भी समुचित स्थान नहीं मिला है।
शिक्षक नहीं, सेनानी बन गए थे मौलवी महमूद हसन और क़ुतुब शाह
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बरेली कॉलेज के शिक्षक मौलवी महमूद हसन (जो आगे चलकर ‘शेख-उल-हिंद’ के नाम से विख्यात हुए) और फारसी के शिक्षक क़ुतुब शाह ने भी छात्रों के साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ बिगुल बजाया। कॉलेज एक राजनीतिक बैठक स्थल बन गया, जहां विद्रोह की योजनाएं तैयार होती थीं।
छात्रों की हड़ताल और पार्क में चलता रहा “क्रांति पाठ”
ब्रिटिश दमन के विरोध में बरेली कॉलेज के छात्रों ने 110 दिन की ऐतिहासिक हड़ताल की। पढ़ाई न रुके। इसके लिए छात्रों ने जुबली पार्क में खुले में कक्षाएं चलाईं। यह वह दौर था जब क्रांति किताबों से नहीं, सीधी टकराहट से सीखी जा रही थी।
राष्ट्रभाषा आंदोलन में भी अग्रणी भूमिका
बरेली कॉलेज सिर्फ 1857 तक सीमित नहीं रहा। 1965 तक चलने वाले राष्ट्रभाषा हिंदी आंदोलन में भी इस संस्थान ने अहम भूमिका निभाई। उस समय के छात्र-शिक्षकों ने मिलकर हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए आंदोलन चलाया। यह कॉलेज भारतीय अस्मिता और भाषा की लड़ाई का भी मंच रहा है।
आज़ाद छात्रावास में फलती-फूलती थी क्रांतिकारी सोच
1906 में बना ‘आज़ाद हॉस्टल’, नाम ही बताता है कि यह छात्रावास केवल निवास नहीं, क्रांतिकारी विचारों का केंद्र था। 1929 से 1943 के बीच यहाँ रहने वाले कई छात्रों ने भारत छोड़ो आंदोलन और सत्याग्रहों में सक्रिय भागीदारी की। वी.डी. सावरकर की किताब ‘1857 की क्रांति’, ‘बरेली गजेटियर’ (1858 संस्करण), और ‘शेख-उल-हिंद मौलाना महमूद हसन की जीवनी’ में बरेली कॉलेज के क्रांतिकारी आंदोलन के बारे में विस्तार से लिखा गया।
