बरेली: इज्जतनगर में सोमवार को ‘बेसिक बायोटेक्नीक्स फॉर जेनेटिक मैनिपुलेशन ऑफ पैथोजेन्स’ विषय पर 10 दिवसीय राष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। यह प्रशिक्षण आईसीएआर प्रायोजित नेटवर्क प्रोग्राम “एप्लिकेशन ऑफ जीनोम एडिटिंग टेक्नोलॉजी फॉर इम्प्रूवमेंट इन लाइवस्टॉक हेल्थ एंड प्रोडक्शन (NP-GET)” के अंतर्गत आयोजित किया जा रहा है।
कार्यक्रम का उद्घाटन और मुख्य अतिथि का संबोधन
मुख्य अतिथि के रूप में डॉ. जी. साईं कुमार, पूर्व प्रमुख, पैथोलॉजी विभाग, आईवीआरआई एवं पूर्व प्रभारी पीएमई सेल ने कार्यक्रम का शुभारंभ किया। उन्होंने अपने संबोधन में जीनोम एडिटिंग के ऐतिहासिक विकास और इसके भविष्य की संभावनाओं पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि अनुवांशिक विज्ञान की नींव 19वीं सदी में मेंडल द्वारा रखी गई थी, जिसने वंशागति के सिद्धांत को वैज्ञानिक रूप दिया। डीएनए की संरचना की खोज के बाद से लेकर आधुनिक CRISPR-Cas तकनीक तक, जीन एडिटिंग ने विज्ञान की दिशा बदल दी है। उन्होंने कहा कि आज वैज्ञानिक नियंत्रित रूप से जीन संशोधन कर पशुओं के स्वास्थ्य और उत्पादन क्षमता को बेहतर बना सकते हैं।
अध्यक्षीय संबोधन और शिक्षा नीति से जुड़ाव
कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. एस. के. मेंदिरत्ता, संयुक्त निदेशक (शैक्षणिक), आईवीआरआई ने की। उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति (NEP) के तहत इस तरह के कौशल आधारित प्रशिक्षण कार्यक्रम आवश्यक हैं, जो विद्यार्थियों को प्रयोगात्मक अनुभव प्रदान करते हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि प्रतिभागियों को अधिक व्यावहारिक प्रशिक्षण देने के लिए समूहों में विभाजित किया जा सकता है, ताकि उन्हें प्रयोगशालाओं में प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त हो सके।
देशभर से आए 22 प्रतिभागी
कार्यक्रम के कोर्स निदेशक डॉ. पी. के. गुप्ता ने बताया कि इस प्रशिक्षण में पंजाब, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, केरल, बिहार और ओडिशा जैसे राज्यों से कुल 22 प्रतिभागियों को चुना गया है, जिनमें वैज्ञानिक, सहायक प्रोफेसर, तकनीकी अधिकारी, शोध फेलो और छात्र शामिल हैं। उन्होंने बताया कि यह कार्यक्रम पशुधन स्वास्थ्य और उत्पादन सुधार के लिए जीनोम एडिटिंग तकनीकों के उपयोग पर केंद्रित है। इस परियोजना में भैंस, भेड़, बकरी, सूअर और मुर्गी जैसे पशुओं में MSTN जीन पर शोध किया जा रहा है, जिससे मांसपेशियों की वृद्धि और उत्पादन क्षमता बढ़ाई जा सकेगी।
युवा वैज्ञानिकों के लिए नया अवसर
पाठ्यक्रम समन्वयक डॉ. बबलू कुमार ने कहा कि इस दस दिवसीय प्रशिक्षण का उद्देश्य युवा वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं को जीनोम प्रसंस्करण, पुनर्योगज प्रौद्योगिकी और आनुवंशिक हेरफेर जैसी आधुनिक तकनीकों में दक्ष बनाना है। यह कार्यक्रम उन्हें मॉलिक्यूलर डायग्नोस्टिक्स और वैक्सीन विकास जैसे क्षेत्रों में व्यावहारिक अनुभव प्रदान करेगा।
कार्यक्रम संचालन और धन्यवाद ज्ञापन
कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. आई. करुणा देवी ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. सोनालिका महाजन ने दिया। इस अवसर पर संयुक्त निदेशक डॉ. सोहिनी डे, डॉ. मदन, डॉ. प्रवीण सिंह सहित विभिन्न विभागों के वैज्ञानिक और अधिकारीगण मौजूद रहे।
