लेखक
संजीव मेहरोत्रा
आज हम याद कर रहे हैं, उस महायोद्धा को, जिसने अपने 25 वर्ष के अल्प जीवन में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक ऐसी वैचारिक ऊँचाई दी। जिसे इतिहास कभी भूल नहीं सकता। जतीन्द्रनाथ दास, वह नाम, जिसने 63 दिन तक भूख और दर्द को मुस्कुराते हुए झेलकर दुनिया को दिखा दिया कि आज़ादी का रास्ता सिर्फ हथियारों से नहीं, बल्कि त्याग और संकल्प से भी होकर जाता है। 27 अक्टूबर 1904 को कलकत्ता में जन्मे जतीन्द्रनाथ दास, बचपन से ही संवेदनशील और तेजस्वी थे। 1920 में मैट्रिक पास करने के बाद ही उन्होंने महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में कूदकर आज़ादी का रास्ता चुन लिया। जेल गए, रिहा हुए, और फिर पढ़ाई करने लौटे। तभी उनकी मुलाकात हुई महान क्रांतिकारी शचीन्द्रनाथ सान्याल से और यहीं से उनकी राह मोड़ गई।
सान्याल के साथ काम करते हुए वे हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) के सक्रिय सदस्य बने। बंगाल में क्रांतिकारी गतिविधियों को संगठित करना, नए युवाओं को जोड़ना और गुप्त प्रशिक्षण देना। इन सबमें जतीन्द्रनाथ दास की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही।
वे सिर्फ विचारों के नहीं, कर्म के क्रांतिकारी
उन्होंने बम बनाना सीखा। 1925 में काकोरी कांड के सिलसिले में गिरफ्तार किए गए, और जेल में भारतीय कैदियों के साथ होने वाले अमानवीय व्यवहार का विरोध करते हुए 21 दिनों तक आमरण अनशन किया। अंततः जेल प्रशासन को झुकना पड़ा और उन्हें रिहा करना पड़ा। यही वह दौर था जब वे भगत सिंह और सुभाष चंद्र बोस के बेहद करीब आए। 1929 में जब भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने असेंबली में बम फेंका, उन बमों के निर्माण में जतीन्द्रनाथ दास की प्रमुख भूमिका थी। 14 जून 1929 को उन्हें लाहौर षड्यंत्र केस में गिरफ्तार कर लिया गया। और फिर शुरू हुआ इतिहास का वह अध्याय, जो भारतीय क्रांतिकारी इतिहास में अमर है।
लाहौर जेल का संघर्ष, 63 दिन का महानत्याग
जेल में भारतीय कैदियों को खाना, कपड़ा, स्वच्छता, कुछ भी नहीं दिया जाता था। ब्रिटिश कैदियों और भारतीयों के साथ किया जा रहा यह घोर भेदभाव जतीन्द्रनाथ दास को अस्वीकार्य था। 13 जुलाई 1929 को उन्होंने आमरण अनशन शुरू किया। जेल अधिकारी उन्हें तोड़ने के लिए हर संभव प्रयास करते रहे। पानी में ताकत बढ़ाने वाली दवाइयाँ मिलाई गईं, जबरन खुराक देने के लिए नाक में रबर ट्यूब डालकर दूध चढ़ाया गया, लेकिन जतीन्द्रनाथ दास झुके नहीं। दूध सांस की नली में चला गया, उनकी हालत बिगड़ती गई, पर उनका संकल्प अडिग रहा। 63वें दिन यानी 13 सितम्बर 1929 को यह 25 वर्षीय नौजवान भारत माता की गोद में सदा के लिए सो गया।
शहादत जिसने भारत को झकझोर दिया
जब उनका पार्थिव शरीर लाहौर से कोलकाता लाया जा रहा था, हर स्टेशन पर भारत थम गया। लोग रोते हुए आगे बढ़े, फूलों और आँसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। कोलकाता में उनके अंतिम संस्कार में 5 लाख से अधिक लोग शामिल हुए। सुभाष चंद्र बोस स्वयं शवयात्रा में कदम से कदम मिलाकर चल रहे थे। जतीन्द्रनाथ दास की शहादत ने अंग्रेज़ी हुकूमत को यह संदेश दे दिया,“भारतीय शरीर को कैद कर सकते हो, आत्मा को नहीं।”
