लेखक
मुहम्मद साजिद
जंग-ए-आजादी की लड़ाई के दौरान मुल्क भर से बगावत की आवाज बुलंद दी थी। मगर, कुछ क्रांतिकारियों ने मुल्क के हर बच्चे को तालीम (शिक्षा) देने का भी बीड़ा उठाया था। इसमें एक नाम सैयद मुहम्मद हुसैन का भी था। उन्होंने अंग्रेजों के स्कूलों के खिलाफ बगावत कर अपने स्कूल खोलने का फैसला लिया। वह बच्चों की तालीम को लेकर हमेशा फिक्रमंद रहते थे। हालांकि, इतिहास के पन्नों में उनका नाम गायब हो चुका है। उनका जन्म बिहार के नालंदा जिले के अस्थावाँ गाँव में हुआ। इस शिक्षाविद् ने बिहार के साथ साथ देश की शिक्षा व्यवस्था को बदलने का बीड़ा उठाया। हालांकि, वह अधिवक्ता (वकील) थे। कलकत्ता हाई कोर्ट में प्रैक्टिस से लेकर पटना ज़िला कोर्ट तक अपनी पहचान बनाई थी। मगर, मुल्क के बच्चों की तालीम को ब्रिटिश हुकूमत से बगावत कर डाली। इस दौरान राजनीति (सियासत) में प्रवेश किया, और पूर्वी पटना मुहम्मडन सीट से कई बार निर्वाचित हुए। इसके बाद ब्रिटिश हुकूमत में 6 मई,1933 को बिहार के शिक्षा मंत्री बने। उन्होंने सैयद मुहम्मद फ़ख़्रुद्दीन के मिशन को आगे बढ़ाया।
ख़ान बहादुर की उपाधि से नवाजा
बच्चों की तालीम को ब्रिटिश हुकूमत से बगावत करने वाले सैयद मुहम्मद हुसैन का इंतकाल (निधन) 26 दिसंबर 1933 को दफ़्तर में काम करते समय हो गया। उनकी सेवा भावना आज भी प्रेरणा देती है। उनको खान बहादुर की उपाधि से नवाजा गया था। वह पहले बिहार के शिक्षा मंत्री थे। हर कहीं उनकी इज्जत थी। बिहार के पाठ्यक्रम (सिलेबस) में उनका जिक्र था। मगर, वक्त के साथ इतिहास की तरह पाठ्यक्रम से भी गायब हो गए।
पटना में पढ़ाई, कोलकाता में वकालत और चार बार MLA
History of Bihar during the British Period” नामक किताब में बिहार में प्रशासनिक और शिक्षा सुधार पर प्रकाश डाला गया। इसमें सैयद मुहम्मद हुसैन का प्रमुखता से उल्लेख किया गया है। किताब के मुताबिक सैयद मुहम्मद हुसैन की प्रारंभिक शिक्षा घर, और पटना कॉलेज से बी.एन. कॉलेज, बी.एल. की पढ़ाई की। इसके बिहार शरीफ़ से वकालत की शुरुआत की, फिर कलकत्ता हाई कोर्ट, और बाद में पटना ज़िला कोर्ट आ गए। उन्होंने पूर्वी पटना मुहम्मडन सीट से 1921, 1924, 1927, 1930 में विधायक चुने गए थे।
जनता से थी मुहब्बत, और हर गम में थे साथ
किताब “Political Evolution of Bihar, 1885–1947” में बिहार के नेताओं के सियासी सफर के बारे में लिखा गया है। इसमें बताया गया है कि सैयद मुहम्मद हुसैन अपनी विधानसभा की जनता से बहुत प्यार करते थे। उनके सुख दुख में हमेशा साथ रहते थे। यहां की जनता भी उनके साथ हर पल खड़ी रहती थी।
