भारत के स्वतंत्रता संग्राम में जहां एक ओर तलवार और लाठी के संघर्ष थे, तो वहीं दूसरी ओर ऐसे भी योद्धा थे, जिनके हथियार थे-इलाज, शिक्षा, एकता और त्याग। हकीम अजमल ख़ान सिर्फ़ एक नामी यूनानी हकीम ही नहीं, बल्कि एक ऐसे नेता थे, जिन्होंने कांग्रेस, मुस्लिम लीग, खिलाफत आंदोलन और यहां तक कि हिंदू महासभा तक का नेतृत्व किया। उन्होंने अपने जीवन को हिंदू-मुस्लिम एकता और औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ़ राष्ट्रीय एकजुटता के लिए समर्पित कर दिया।
दिल्ली-6 की शरीफ़ मंज़िल से आज़ादी की लड़ाई तक
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लाल कुआं, दिल्ली-6 की शरीफ़ मंज़िल, यही वह ऐतिहासिक हवेली है, जहां हकीम अजमल ख़ान रहते थे। 13 अप्रैल, 1915 को यहीं महात्मा गांधी और कस्तूरबा गांधी उनसे मिलने आए थे। हकीम साहब और गांधी जी की पहली मुलाकात दीनबंधु सी.एफ. एंड्रूज़ के जरिए हुई, और यही मुलाकात आगे चलकर दोनों के जीवन में एक नया अध्याय लिखने वाली थी।
इलाज में इंसानियत, राजनीति में एकता
हकीम अजमल ख़ान के पास चेहरा देखकर बीमारी पहचानने की विलक्षण क्षमता थी। वह गरीबों का मुफ्त इलाज करते और अमीर मरीजों से शुल्क लेते। उनकी औषधियों से कई गंभीर बीमारियां ठीक होती थीं, जिनमें रामपुर के नवाब की बेगम का इलाज ऐतिहासिक रूप से दर्ज है, लेकिन उनकी पहचान सिर्फ़ हकीम के रूप में नहीं थी। वह एक राष्ट्रीय नेता भी थे। उन्होंने 1921 में अखिल भारतीय कांग्रेस की अध्यक्षता की, 1919 में मुस्लिम लीग के अध्यक्ष बने और 1920 में खिलाफत आंदोलन के नेता रहे। यहां तक कि हिंदू महासभा के भी अध्यक्ष पद को उन्होंने संभाला।
तिब्बिया कॉलेज, और अस्पताल की गांधी से रखवाई नींव
शिक्षा और संस्थान निर्माण में भी उनका मुख्य योगदान था। महात्मा गांधी के सुझाव पर तिब्बिया कॉलेज और अस्पताल (1921) में खोला। इसका उद्घाटन गांधी जी के हाथों कराया। जामिया मिल्लिया इस्लामिया के पहले कुलाधिपति बने, लेकिन अपनी जेब से शुरुआती खर्च उठाए। जामिया को अलीगढ़ से दिल्ली शिफ्ट करवाया, और संकट के समय स्वयं धन जुटाया।
हिंदू-मुस्लिम एकता पर उनका संदेश
हकीम साहब का मानना था कि “हमारे देश की प्रगति का रहस्य हिंदुओं, मुसलमानों और भारत की सभी जातियों की एकता में निहित है।” उन्होंने गौरक्षा आंदोलन को सांप्रदायिक दायरे से बाहर निकालने की अपील की और ब्रिटिश सत्ता को चुनौती देने का आह्वान किया।
दिल्ली भूल गई कुर्बानियां
दिल्ली में उनका योगदान अमिट है, लेकिन आज उनकी कब्र की बदहाल स्थिति देखकर सवाल उठता है कि जिस इंसान ने तिब्बिया कॉलेज और जामिया जैसी संस्थाएं खड़ी कीं, उसे दिल्ली क्यों भूल गई? पाकिस्तान में आज भी उनके नाम पर दवाखाने चलते हैं, लेकिन भारत में उनके योगदान को नया जीवन देने की जरूरत है।
एकता, सेवा और आज़ादी के प्रतीक
हकीम अजमल ख़ान सिर्फ़ एक महान हकीम नहीं थे, बल्कि एकता, सेवा और आज़ादी के प्रतीक थे। उन्होंने धर्म से ऊपर उठकर भारत की आज़ादी और समाज की बेहतरी के लिए जो काम किए, वो आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा हैं।
