डॉ. सैफुद्दीन किचलू, यह नाम इतिहास के उस पन्ने पर दर्ज है, जो आज भी जला हुआ है, लेकिन भुलाया नहीं जा सकता। वे केवल एक मुसलमान नेता नहीं थे, वे भारत की आत्मा में यकीन करने वाले राष्ट्रभक्त थे। जलियांवाला बाग नरसंहार, जिसने देश को झकझोर कर रख दिया था उसके पीछे जो असली कारण था, वो थी किचलू और सत्यपाल की गिरफ्तारी। 1919 में रोलेट एक्ट के खिलाफ जब गांधी जी ने आंदोलन का आह्वान किया, तब पंजाब में दो नाम सबसे पहले गूंजे डॉ. सैफुद्दीन किचलू और डॉ. सत्यपाल। इन दोनों की गिरफ्तारी के बाद ही 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग में लोग एकत्र हुए, और जनरल डायर ने निहत्थे नागरिकों पर गोलियां चलवा दीं। पर इतिहास के पन्ने यहीं नहीं रुकते। अंग्रेज़ों ने हिंदू-मुस्लिम एकता से घबराकर गुजरांवाला में हवाई जहाज़ से बमबारी कराई, स्कूल, मस्जिद, छात्रावास और शादी जैसे कार्यक्रमों पर बम गिराए। यह था भारत में ब्रिटिश आतंकवाद का चेहरा।
सांप्रदायिकता के ज़हर के खिलाफ लड़ाई
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डॉ. किचलू की ये लड़ाई सिर्फ आज़ादी की नहीं थी, बल्कि सांप्रदायिकता के ज़हर के खिलाफ भी थी। जब 1947 में देश का बंटवारा हुआ, और उनका घर अमृतसर में जला दिया गया, तब भी उन्होंने पाकिस्तान नहीं चुना। उन्होंने कहा “हमने राष्ट्रीयता के लिए संघर्ष किया है, मज़हब के लिए नहीं!”
पंजाब कांग्रेस के पहले अध्यक्ष
वो पंजाब कांग्रेस के पहले अध्यक्ष थे, नौजवान भारत सभा के संस्थापक, और जामिया मिलिया इस्लामिया के संस्थापक सदस्य। उन्हें स्टालिन शांति पुरस्कार से भी नवाजा गया। उनका जीवन आज के दौर में एक चेतावनी है, जब देश को बांटने की कोशिश होती है, तो याद रखना, इतिहास ने ऐसे “विभाजन विरोधियों” को कभी नहीं भुलाया, “जब कोई पूछे कि आज़ादी की कीमत क्या थी… तो सिर्फ जलियांवाला बाग की तस्वीर मत दिखाना… किचलू जैसे उन हज़ारों नामों को भी याद रखना… जो ज़िंदा जलते रहे पर भारत को एक रखा।”
