28 जुलाई को हम उस व्यक्ति को याद करते हैं। जिसने आज़ाद भारत में क्रांतिकारी चेतना को जिंदा रखने का सबसे बड़ा काम किया। कॉमरेड चारु मजूमदार का जन्म 28 जुलाई, 1972 को हुआ था, जब भारत की मुख्यधारा वामपंथी पार्टियाँ संसदीय सुधारवाद की ओर मुड़ गई थीं। चारु मजूमदार ने शोषित किसानों, मजलूम आदिवासियों और दमित तबकों के लिए एक सशस्त्र जन-क्रांति का सपना देखा और विद्रोह के ज़रिए जमीन पर उतार दिया।
शहादत नहीं, विचारों की विरासत है चारु मजूमदार
1972 में कोलकाता के लालबाजार थाने में हिरासत में उनकी मृत्यु को आज 53 वर्ष से अधिक हो चुके हैं, लेकिन सियासी पार्टी आज भी उनके विचारों से डरती है। यही कारण है कि ‘अर्बन नक्सल’ जैसे शब्द आज भी प्रचलन में हैं, जो दरअसल इस बात का सबूत हैं कि चारु मजूमदार की क्रांति की चिंगारी बुझी नहीं, सुलग रही है।
सिर्फ आंदोलन नहीं, क्रांति की चेतना
चारु मजूमदार के नेतृत्व में आंदोलन,यह विद्रोह केवल भूमि अधिकार का संघर्ष नहीं था। उस समय की व्यवस्था के विरुद्ध एक सटीक वैचारिक प्रहार था। इसने सैकड़ों युवाओं को गांवों की ओर लौटकर किसानों के साथ खड़ा होने को प्रेरित किया। यह वही चेतना थी जिसे भगत सिंह ने युवाओं में जगाने का आह्वान किया था।
साहित्य और सिनेमा तक पहुंची क्रांति की लहर
चारु मजूमदार के आंदोलन ने भारतीय साहित्य और सिनेमा को भी झकझोर दिया। महाश्वेता देवी की हज़ार चौरासी की मां और मधुकर सिंह का जगदीश कभी नहीं मरते जैसे उपन्यास इसका प्रमाण हैं। यह वह दौर था, जब क्रांति केवल राजनीति नहीं, संस्कृति का भी सवाल बन गई थी।
चारु मजूमदार की अंतिम चेतावनी
अपनी मृत्यु से पहले चारु मजूमदार ने पार्टी कार्यकर्ताओं से कहा था — “जनता से रिश्ता मत तोड़ना, उनका विश्वास सबसे बड़ा हथियार है।” यह विचार आज भी भारत के जनांदोलनों की आत्मा है।
