मुहम्मद साजिद
आज पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी की पुण्यतिथि है। एक ऐसा नेता जिनका प्रधानमंत्री काल भले ही केवल 7 महीने का रहा हो, लेकिन जिनकी वैचारिक राजनीति ने दशकों तक देश की दिशा और सोच को आकार दिया।
बलिया से दिल्ली तक सिद्धांतों की पदयात्रा
17 अप्रैल 1927, उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के इब्राहिमपट्टी गांव में जन्मे चंद्रशेखर ने ग्रामीण जीवन से निकली समझ और संघर्ष की भावना के साथ राजनीति में कदम रखा। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में पढ़ाई पूरी करने के बाद वे समाजवादी आंदोलन से जुड़े और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के ज़रिए राजनीतिक यात्रा शुरू की। उनकी निर्भीकता और बेबाक बोल ने उन्हें 1960-70 के दशक में कांग्रेस में रहते हुए “युवा तुर्क” बना दिया।
इमरजेंसी में जेल, सत्ता को ठोकर
1975 में आपातकाल के दौरान चंद्रशेखर उन चंद कांग्रेस नेताओं में शामिल थे। जिन्होंने इंदिरा गांधी की नीतियों का विरोध किया और जेल गए। इसके बाद में उन्होंने जनता पार्टी का नेतृत्व संभाला और 1983 में कन्याकुमारी से दिल्ली तक 4200 किलोमीटर की ऐतिहासिक पदयात्रा की। यह पदयात्रा ग्रामीण भारत की समस्याओं को जानने और समझने का एक जीवंत प्रयास थी,जब टीवी कैमरे नहीं थे, पर जनता का समर्थन भरपूर था।
प्रधानमंत्री बने, लेकिन सिद्धांतों से समझौता नहीं
10 नवंबर 1990 को चंद्रशेखर ने भारत के 8वें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। कांग्रेस के बाहरी समर्थन से, लेकिन यह समर्थन राजीव गांधी की जासूसी के आरोपों के बाद टूट गया और 6 मार्च 1991 को उन्होंने इस्तीफा दे दिया। इस छोटे कार्यकाल में भी उन्होंने तमिलनाडु की करुणानिधि सरकार को बर्खास्त किया। आर्थिक सुधारों की नींव रखी। राम मंदिर विवाद पर हिंदू-मुस्लिम संवाद की कोशिश की। उनका कार्यकाल राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक संकट के बीच रहा, लेकिन उनकी गरिमा और संकल्प अडिग रहे।
बलिया की यात्रा और फफक कर रोना
10 अक्टूबर 2006 को चंद्रशेखर आख़िरी बार बलिया पहुंचे। लंबी बीमारी के बावजूद वे ट्रेन से आए, और जब जनता का अभूतपूर्व प्रेम देखा, तो फफक-फफक कर रो पड़े। बलिया उनके लिए केवल एक संसदीय क्षेत्र नहीं, माँ थी।
आदर्शों की मिसाल, जिसे आज की राजनीति तरस रही है
8 जुलाई 2007 को चंद्रशेखर का निधन हो गया, लेकिन उनके विचार आज भी प्रासंगिक हैं। वे कहते थे, “राजनीति सत्ता की नहीं, सेवा की होनी चाहिए।”उनकी वैचारिक मजबूती, समाजवादी सोच और सादगी आज भी प्रेरणा देती है।
