मुहम्मद साजिद
भारत का स्वतंत्रता संग्राम केवल राजनीतिक रणनीतियों या आंदोलनों की श्रृंखला नहीं था, बल्कि उसमें भावनाओं, विचारधाराओं और व्यक्तित्वों की टकराहट और समन्वय की गहराई भी शामिल थी। इस क्रम में दो शीर्ष स्वतंत्रता सेनानियों महात्मा गांधी और नेताजी सुभाष चंद्र बोस की भूमिकाएं ऐतिहासिक रूप से विशिष्ट थीं। भले ही दोनों की कार्यशैली अलग थी, लेकिन भारत की आज़ादी के लिए दोनों की प्रतिबद्धता अद्वितीय थी। इन्हीं दो विचारधाराओं के संगम का प्रतीक बना वह क्षण, जब नेताजी ने पहली बार 91 साल पहले महात्मा गांधी को “राष्ट्रपिता” कहकर संबोधित किया।
6 जुलाई 1944, रंगून रेडियो से गूंजा एक भावुक संदेश
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द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, जब सुभाष चंद्र बोस आज़ाद हिंद फौज के साथ अंग्रेजों से निर्णायक संघर्ष की तैयारी में थे। उन्होंने बर्मा (अब म्यांमार) के रंगून रेडियो से भारतवासियों को संबोधित किया। उस ऐतिहासिक दिन उन्होंने महात्मा गांधी को एक ऐसा संबोधन दिया, जो आने वाले युगों तक अमर हो गया “हमारे राष्ट्रपिता”। “हमारे राष्ट्रपिता, भारत की स्वतंत्रता के इस युद्ध में आपका आशीर्वाद और शुभकामनाएं चाहते हैं।”यह संदेश उस समय दिया गया, जब गांधी जी अंग्रेजों की कैद में थे और उनकी पत्नी कस्तूरबा गांधी का निधन हो चुका था। गांधी जी का स्वास्थ्य भी गिरता जा रहा था। नेताजी का यह संदेश भावनात्मक भी था और रणनीतिक भी, यह गांधी जी से आशीर्वाद माँगने का प्रयास था ताकि स्वतंत्रता आंदोलन की एकता बनी रहे।
गांधी जी नहीं रहे, “संदेश सुन गमजदा हो गया हिंदुस्तान”
सुभाष चंद्र बोस द्वारा गांधी जी को ‘राष्ट्रपिता’ कहने का पहला दस्तावेज़ी उल्लेख 6 जुलाई 1944 के रेडियो रंगून के प्रसारण में मिलता है। इसको स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास पर लिखी पुस्तक“Subhas Chandra Bose: The Springing Tiger”- Hugh Toye, “Mahatma Gandhi and Subhas Chandra Bose: A Clash of Ideologies”: Rudrangshu Mukherjee में भी लिखा है। मगर, पंडित जवाहर लाल नेहरू का 1948 में रेडियो संदेश, जिसमें “राष्ट्रपिता अब नहीं रहे।” (30 जनवरी 1948 को गांधी जी की हत्या के बाद) को सुनकर हिंदुस्तान का हर इंसान गमजदा हो गया।
विरोध के बावजूद सम्मान
नेताजी और गांधी जी के बीच वैचारिक मतभेद जगज़ाहिर थे। 1939 के कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव में नेताजी ने गांधी जी के समर्थन प्राप्त उम्मीदवार पट्टाभि सीतारमैया को हराया था। इसे गांधी की नैतिक हार माना गया। इसके बाद वर्किंग कमेटी के 13 सदस्यों ने नेताजी के खिलाफ इस्तीफ़ा दे दिया। जिससे नेताजी को कांग्रेस अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देना पड़ा। परंतु, यही नेताजी जब वर्षों बाद विदेशी भूमि से लड़ रहे थे, तब उन्होंने अपने शब्दों से यह स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत मतभेद, राष्ट्रीय सम्मान से ऊपर नहीं होते।
