मुहम्मद साजिद
भारत के स्वतंत्रता संग्राम की गाथा में हजारों ऐसे नाम हैं, जिन्हें इतिहास के पन्नों ने उतनी जगह नहीं दी। जितने वे हकदार थे। उन्हीं में से एक महान क्रांतिकारी थे मौलाना हबीब उर रहमान लुधियानवी-जिनका 129वां जन्म दिवस आज हम मना रहे हैं।
एक फकीर नहीं, आज़ादी का सिपाही
मौलाना हबीब उर रहमान सिर्फ एक धार्मिक नेता नहीं, बल्कि ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिलाने वाले क्रांतिकारी थे। 3 जुलाई 1892 को लुधियाना में जन्मे इस राष्ट्रनायक ने दारुल उलूम देवबंद से तालीम पूरी की और असहयोग आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया। उन्हें 14 साल की सख्त कैद की सज़ा मिली, लेकिन उनके इरादे न डिगे।
हिन्दू पानी-मुसलमान पानी का दिया जवाब
जब अंग्रेज़ों ने रेलवे स्टेशनों पर ‘हिंदू पानी’ और ‘मुसलमान पानी’ के नाम से मटके रखकर समाज को तोड़ने की साजिश रची, तब मौलाना ने एक क्रांतिकारी ऐलान किया। बोले, “हर पानी एक है!”उन्होंने पेशावर से लेकर दिल्ली तक मटके तुड़वाए और इस ‘गुनाह’ में भी जेल गए। उनका यह कदम सांप्रदायिक एकता की मिसाल बना।
भगत सिंह के घर के रखवाले
जब देश के महान शहीद भगत सिंह की खोज में अंग्रेज़ उनके परिवार तक जा पहुंचे, तब किसी ने शरण नहीं दी। लेकिन मौलाना हबीब उर रहमान ने भगत सिंह के पूरे परिवार को अपने घर में पनाह दी। ये वो दौर था, जब डर सबके चेहरे पर था, लेकिन हबीब साहब के दिल में इंकलाब था।
जामा मस्जिद पर फहराया तिरंगा
1931 में जब दिल्ली के जामा मस्जिद पर ब्रिटिश झंडा फहरा दिया गया, तब मौलाना ने जान की परवाह न करते हुए तिरंगा फहराया। उस वक्त ब्रिटिश सैनिकों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया, पर उनका संदेश स्पष्ट था, भारत एक है, और रहेगा।
बंटवारे का किया विरोध और गांधीजी से संवाद
1947 में जब बंटवारा हुआ, तब भी मौलाना ने पाकिस्तान जाने से इनकार कर दिया। उनका मानना था “भारत मेरी मिट्टी है, मेरा वजूद है, मैं इसे छोड़कर नहीं जाऊंगा।”गांधीजी से उन्होंने आग्रह किया कि वो ब्रिटेन जाकर दुनिया को बताएं कि “भारत में इंसानियत खतरे में है, इस्लाम नहीं!” गांधीजी ने मरणव्रत की घोषणा की और वही कदम दिल्ली में दंगों को थामने की वजह बना।
मुस्लिम मुल्कों से कराए बेहतर संबंध
1952 में उन्होंने भारत और मुस्लिम दुनिया के रिश्तों को मज़बूत करने के लिए सऊदी अरब की यात्रा की। 2 सितंबर 1956 को, यह योद्धा इस दुनिया से चला गया। लेकिन आज भी जामा मस्जिद, दिल्ली के पास उनका मक़बरा देश के उस इतिहास की गवाही देता है, जो जोड़ता है – तोड़ता नहीं। मौलाना हबीब उर रहमान लुधियानवी वो नाम हैं, जिन्हें इतिहास ने अगर उचित स्थान नहीं दिया, तो यह हमारा कर्तव्य है कि आने वाली पीढ़ियों को उनका परिचय दें। वो एक विचार थे, धर्मनिरपेक्षता, राष्ट्रीयता और न्याय का, जिनके जैसा दूसरा होना मुश्किल है। आज जब देश को फिर से एकता की ज़रूरत है, तो मौलाना जैसे नायकों को याद करना और उनके रास्ते पर चलना ही सच्ची खिराज-ए-अकीदत (श्रद्धांजलि) होगी।
