छह एकड़ जमीन पर इंडियन ऑयल स्थापित करेगा प्लांट, रोजाना 200 मीट्रिक टन जैविक कचरे का होगा निस्तारण
बरेली : शहर में कूड़े के निस्तारण की समस्या को दूर करने के साथ ही उससे स्वच्छ ऊर्जा तैयार करने की दिशा में एक बड़ी पहल की तैयारी की जा रही है। बरेली के सथरापुर स्थित कूड़ा निस्तारण प्लांट में अब जैविक कचरे और डेयरियों से निकलने वाले गोबर से कंप्रेस्ड बायोगैस (सीबीजी) तैयार की जाएगी। इसके लिए करीब 50 करोड़ रुपये की लागत से सीबीजी प्लांट स्थापित करने की योजना है। इस परियोजना को इंडियन ऑयल और नगर निगम मिलकर आगे बढ़ाएंगे। प्रस्तावित योजना के तहत छह एकड़ जमीन पर इंडियन ऑयल की ओर से प्लांट लगाया जाएगा।
नगर निगम और इंडियन ऑयल के बीच इस परियोजना को लेकर समझौते की प्रक्रिया चल रही है। नगर आयुक्त संजीव कुमार मौर्य के अनुसार, समझौते की प्रक्रिया अगले दो माह में पूरी होने की उम्मीद है। समझौता होने के बाद प्लांट की स्थापना और अन्य जरूरी प्रक्रियाओं को आगे बढ़ाया जाएगा।
रोजाना 200 मीट्रिक टन जैविक कचरे से बनेगी गैस
प्रस्तावित सीबीजी प्लांट की सबसे बड़ी खासियत इसकी प्रतिदिन 200 मीट्रिक टन जैविक कचरे के निस्तारण की क्षमता होगी। इसमें शहर के घरों, होटलों, रेस्टोरेंट, सब्जी मंडियों और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से निकलने वाले गीले कचरे का इस्तेमाल किया जाएगा। इसके साथ ही आसपास की डेयरियों से गोबर भी एकत्र किया जाएगा।अभी तक जिस गीले कचरे और गोबर के निस्तारण को नगर निगम के लिए चुनौती माना जाता है, उसी जैविक सामग्री को इस परियोजना के माध्यम से ऊर्जा उत्पादन के लिए उपयोग में लाया जाएगा। इससे कचरे के वैज्ञानिक निस्तारण को बढ़ावा मिलने के साथ ही उसे उपयोगी संसाधन में बदलने का रास्ता खुलेगा।
ऐसे कूड़े से तैयार होगी कंप्रेस्ड बायोगैस
प्लांट में सबसे पहले एकत्र किए गए जैविक कचरे को अलग -अलग करके प्रोसेस किया जाएगा। इसके बाद नियंत्रित प्रक्रिया के माध्यम से उससे बायोगैस तैयार की जाएगी। इस गैस में मौजूद कार्बन डाइऑक्साइड, नमी और अन्य अशुद्धियों को अलग किया जाएगा। निर्धारित गुणवत्ता मानकों के अनुसार शुद्ध करने के बाद गैस को संपीड़ित यानी कंप्रेस करके सीबीजी के रूप में तैयार किया जाएगा। सीबीजी में मुख्य रूप से मीथेन गैस होती है। इसे निर्धारित दबाव और गुणवत्ता मानकों के अनुरूप तैयार किया जाता है, जिससे इसका इस्तेमाल वाहनों में सीएनजी के विकल्प के रूप में किया जा सके। इसके अलावा उपयुक्त व्यवस्था और मानकों के अनुसार गैस की औद्योगिक उपयोग की संभावनाएं भी तलाशी जा सकती हैं।
वाहनों और औद्योगिक इकाइयों में होगा इस्तेमाल
प्लांट में तैयार होने वाली सीबीजी का इस्तेमाल कार, ऑटो, बस और अन्य गैस आधारित वाहनों में किया जा सकेगा। इसके लिए गैस की गुणवत्ता और वितरण की जरूरी व्यवस्थाएं करनी होंगी।इसके अलावा शुद्ध बायोगैस को उपयुक्त तकनीकी व्यवस्था के माध्यम से औद्योगिक इकाइयों तक पहुंचाने की भी संभावना है। इससे उद्योगों को ऊर्जा का एक वैकल्पिक स्रोत मिल सकता है। हालांकि, गैस की वास्तविक उत्पादन क्षमता, बिक्री और वितरण का स्वरूप परियोजना के तकनीकी आकलन और इंडियन ऑयल के साथ होने वाले समझौते की शर्तों पर निर्भर करेगा।
बचे हुए पदार्थ से खाद बनाने की भी संभावना
बायोगैस तैयार करने की प्रक्रिया के बाद जो जैविक पदार्थ बचता है, उसका उपयोग निर्धारित गुणवत्ता के अनुसार जैविक खाद बनाने में किया जा सकता है। यदि इसके लिए जरूरी तकनीकी व्यवस्था विकसित होती है तो किसानों और बागवानी से जुड़े लोगों को भी इसका लाभ मिल सकता है। इस तरह परियोजना से कचरे का निस्तारण, ऊर्जा उत्पादन और जैविक खाद तैयार करने की संभावनाएं एक साथ विकसित हो सकती हैं।
नगर निगम की आमदनी में भी होगी बढ़ोतरी
इस परियोजना से नगर निगम को केवल कचरा निस्तारण में ही राहत मिलने की उम्मीद नहीं है, बल्कि आर्थिक लाभ की भी संभावना है। योजना के मुताबिक, गैस की बिक्री से होने वाली आय में नगर निगम को भी हिस्सा मिलेगा। इससे निगम के राजस्व में बढ़ोतरी हो सकती है और कचरा प्रबंधन पर होने वाले खर्च को कम करने में भी मदद मिल सकती है। हालांकि, नगर निगम को मिलने वाली आय कितनी होगी, गैस की बिक्री किस व्यवस्था के तहत होगी और राजस्व का बंटवारा किस अनुपात में किया जाएगा, यह सब इंडियन ऑयल और नगर निगम के बीच होने वाले समझौते की शर्तों से स्पष्ट होगा।
शहर की सफाई और पर्यावरण के लिए अहम परियोजना
बरेली में तेजी से बढ़ते शहरीकरण के साथ प्रतिदिन निकलने वाले गीले कचरे का वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण करना नगर निगम के सामने एक बड़ी चुनौती है। ऐसे में सथरापुर में प्रस्तावित सीबीजी प्लांट को कचरा प्रबंधन और स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन की दिशा में महत्वपूर्ण परियोजना माना जा रहा है। इससे एक तरफ जैविक कचरे को खुले में फेंकने या अनुपयोगी तरीके से निस्तारित करने की जरूरत कम हो सकती है, वहीं दूसरी तरफ पारंपरिक ईंधन पर निर्भरता घटाने में भी मदद मिल सकती है। परियोजना पूरी होने और संचालन शुरू होने के बाद बरेली में कचरे को ऊर्जा में बदलने की नई व्यवस्था विकसित होगी।
