ओवैसी ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के कानून को रद्द करने की मांग की
लखनऊ : एआईएमआईएम अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से जुड़े मामले और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर केंद्र सरकार पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से संबंधित कानून को रद्द करने की मांग की। ओवैसी का कहना है कि नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव जरूरी है, ताकि चुनाव आयोग की विश्वसनीयता को लेकर उठ रहे सवालों का समाधान हो सके।
नियुक्ति प्रक्रिया में सीजेआई को शामिल करने की पैरवी
ओवैसी ने मांग की कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करने वाली समिति में प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता के साथ भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) को भी शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि विधेयक पेश होने के समय ही उन्होंने इसके प्रावधानों पर आपत्ति जताई थी। ओवैसी ने कानून में चुनाव आयुक्तों को सेवानिवृत्ति के बाद कानूनी सुरक्षा दिए जाने के प्रावधान पर भी सवाल उठाए।
एसआईआर प्रक्रिया पर ओवैसी ने जताई आपत्ति
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर भी ओवैसी ने सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि इस प्रक्रिया के तहत 10 करोड़ नाम हटाए जा चुके हैं। उन्होंने फॉर्म-6 के आवेदकों की मैपिंग पर जोर दिए जाने का मुद्दा भी उठाया और एसआईआर प्रक्रिया बंद करने की मांग की। नाम हटाए जाने का आंकड़ा ओवैसी के दावे के रूप में सामने आया है।
इंडिया गठबंधन के प्रदर्शन से अलग रहने की बात कही
इंडिया गठबंधन के विरोध प्रदर्शन पर ओवैसी ने कहा कि विरोध करना प्रत्येक नागरिक का अधिकार है। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि वह इंडिया गठबंधन का हिस्सा नहीं हैं, इसलिए उसके प्रदर्शन पर टिप्पणी नहीं कर सकते। उनका बयान ऐसे समय आया है, जब चुनाव आयोग की नियुक्ति और मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर राजनीतिक बहस जारी है।
सीजेआई से मुलाकात पर उठाया शक्तियों के पृथक्करण का मुद्दा
भारत के मुख्य न्यायाधीश से मुलाकात करने की इंडिया गठबंधन की पहल पर ओवैसी ने विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्तियों के बंटवारे का मुद्दा उठाया। उन्होंने सवाल किया कि सांसद मुख्य न्यायाधीश से किस आधार पर मुलाकात कर सकते हैं। ओवैसी ने ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ से जुड़ी स्थायी समिति की ओर से उच्चतम न्यायालय से मुलाकात की कोशिश का भी उल्लेख किया और कहा कि संवैधानिक संस्थाओं के बीच शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का ध्यान रखा जाना चाहिए।
