एडीआर और नेशनल इलेक्शन वॉच की रिपोर्ट में सामने आया आंकड़ा, 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में जनप्रतिनिधियों ने बदली राजनीतिक पार्टी
नई दिल्ली: एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स और नेशनल इलेक्शन वॉच के नए विश्लेषण में 2022 से 2026 के बीच चुनाव जीतने के बाद पार्टी बदलने वाले मौजूदा सांसदों और विधायकों का आंकड़ा सामने आया है। रिपोर्ट के मुताबिक इस अवधि में 111 मौजूदा सांसदों और विधायकों ने राजनीतिक पार्टी बदली। इनमें 26 लोकसभा सांसद, 7 राज्यसभा सांसद और 78 विधायक शामिल हैं। एडीआर ने यह विश्लेषण 12 जुलाई 2026 तक के आंकड़ों के आधार पर किया है।
नागालैंड में सबसे ज्यादा 32 जनप्रतिनिधियों ने बदली पार्टी
एडीआर के मुताबिक 111 दलबदल के मामले 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में सामने आए। सबसे ज्यादा मामले नागालैंड में रहे, जहां 32 जनप्रतिनिधियों ने पार्टी बदली। इसके बाद पश्चिम बंगाल में 20 मामले सामने आए। रिपोर्ट में तेलंगाना में 9 और गोवा तथा पंजाब में 8-8 जनप्रतिनिधियों के पार्टी बदलने का जिक्र है। एडीआर ने स्पष्ट किया है कि इन आंकड़ों में केवल व्यक्तिगत दलबदल ही शामिल नहीं हैं, बल्कि पार्टी विलय, इस्तीफा देकर उपचुनाव जीतने और अयोग्य ठहराए जाने के बाद दूसरी पार्टी से उपचुनाव जीतने के मामले भी शामिल हैं।
भाजपा में गए 29 जनप्रतिनिधि
रिपोर्ट के अनुसार 111 जनप्रतिनिधियों में से 29 यानी करीब 26 प्रतिशत दूसरी पार्टियों से भाजपा में शामिल हुए। इनमें 7 राज्यसभा सांसद और 22 विधायक शामिल हैं। एडीआर के आंकड़ों के मुताबिक इस अवधि में कोई लोकसभा सांसद सीधे भाजपा में शामिल होने वालों की सूची में नहीं है। भाजपा में शामिल होने वाले राज्यसभा सदस्यों में आम आदमी पार्टी से चुने गए सात सदस्य शामिल रहे। वहीं विधायकों के स्तर पर गोवा और गुजरात कांग्रेस के अलावा मणिपुर के जदयू विधायकों तथा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और कर्नाटक के कुछ विधायकों के पार्टी बदलने के मामले भी रिपोर्ट में दर्ज हैं।
एनपीएफ में शामिल हुए सबसे ज्यादा 32 जनप्रतिनिधि
111 मामलों में सबसे ज्यादा 32 जनप्रतिनिधि नागा पीपुल्स फ्रंट यानी एनपीएफ में शामिल हुए। हालांकि, यह संख्या व्यक्तिगत तौर पर 32 विधायकों के अलग-अलग दल बदलने के बजाय नागालैंड में हुए राजनीतिक विलय से जुड़ी है। एडीआर के अनुसार नागालैंड में राष्ट्रवादी लोकतांत्रिक प्रगतिशील पार्टी और नागा पीपुल्स फ्रंट के बीच विलय के बाद एनपीएफ को बड़ी संख्या में विधायक मिले। रिपोर्ट में 25 ऐसे जनप्रतिनिधियों का भी उल्लेख है, जो मूल रूप से एनडीपीपी से निर्वाचित हुए थे।
पश्चिम बंगाल में 20 लोकसभा सांसदों ने बदला राजनीतिक ठिकाना
पश्चिम बंगाल में दर्ज 20 के सभी मामले लोकसभा सदस्यों से जुड़े हैं। एडीआर के मुताबिक ये सभी सांसद पहले अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर निर्वाचित हुए थे और बाद में नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया में चले गए। इसके साथ एनसीपीआई 20 जनप्रतिनिधियों के साथ दूसरी पार्टियों से सबसे ज्यादा जनप्रतिनिधि पाने वाली पार्टियों में तीसरे स्थान पर रही। एडीआर के आंकड़ों के अनुसार 111 मामलों में एनपीएफ को 32, भाजपा को 29 और एनसीपीआई को 20 जनप्रतिनिधि मिले। इसके अलावा कांग्रेस को 9, शिवसेना को 8, एनपीपी को 6 और पीपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल को 4 जनप्रतिनिधि मिले। इन तीन प्रमुख प्राप्तकर्ता दलों—एनपीएफ, भाजपा और एनसीपीआई—को कुल 81 यानी करीब 73 प्रतिशत जनप्रतिनिधि मिले।
किन पार्टियों से सबसे ज्यादा जनप्रतिनिधि गए?
एडीआर की रिपोर्ट में मूल राजनीतिक दलों के स्तर पर सबसे ज्यादा पलायन एनडीपीपी से दर्ज हुआ। इसके 25 जनप्रतिनिधियों ने पार्टी बदली। इसके बाद तृणमूल कांग्रेस से 20 और कांग्रेस से 19 जनप्रतिनिधियों के पार्टी बदलने के मामले सामने आए। इन तीनों दलों से कुल 64 यानी 58 प्रतिशत जनप्रतिनिधियों का पलायन हुआ। इसके अलावा बीआरएस के 9, आम आदमी पार्टी और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के 7-7 तथा शिवसेना के 6 जनप्रतिनिधियों के पार्टी बदलने का आंकड़ा रिपोर्ट में दर्ज है।
लोकसभा और राज्यसभा के कितने सांसदों ने बदली पार्टी?
एडीआर के विश्लेषण के मुताबिक वर्तमान लोकसभा के 543 सदस्यों में से 26 यानी करीब 5 प्रतिशत और राज्यसभा के 233 सदस्यों में से 7 यानी करीब 3 प्रतिशत ने चुनाव जीतने के बाद पार्टी बदली। वहीं राज्यों की विधानसभाओं के करीब 4,100 विधायकों में 78 यानी लगभग 2 प्रतिशत के पार्टी बदलने के मामले दर्ज किए गए।
ADR ने कहा- आंकड़ा पूरी तरह अंतिम नहीं
एडीआर ने रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया है कि देश में सांसदों और विधायकों के पार्टी बदलने का कोई व्यवस्थित और आसानी से उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ा नहीं है। इसी वजह से रिपोर्ट में शामिल 111 मामलों की सूची पूरी तरह अंतिम होने की गारंटी नहीं दी जा सकती। संगठन के मुताबिक कुछ अन्य मामले भी इसमें शामिल नहीं हो पाए हो सकते हैं।
ADR ने दल-बदल कानून में बदलाव की सिफारिश की
रिपोर्ट जारी करने के साथ एडीआर ने दल-बदल विरोधी कानून में बदलाव की भी सिफारिश की है। संगठन ने संविधान की दसवीं अनुसूची में संशोधन की मांग की है। एडीआर का सुझाव है कि सांसदों की अयोग्यता से जुड़े मामलों में फैसला राष्ट्रपति और विधायकों के मामलों में राज्यपाल लें तथा यह निर्णय चुनाव आयोग की सलाह के आधार पर हो। फिलहाल अयोग्यता संबंधी ऐसे मामलों में सदन के पीठासीन अधिकारी की भूमिका होती है। इसके अलावा एडीआर ने अयोग्यता याचिकाओं पर फैसला लेने के लिए निश्चित समय-सीमा तय करने और दल-बदल करने वाले जनप्रतिनिधियों के दोबारा निर्वाचित होने तक सार्वजनिक पद संभालने पर प्रतिबंध जैसे बदलावों की भी सिफारिश की है।
ADR क्या है और कैसे शुरू हुआ?
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की स्थापना 1999 में भारतीय प्रबंधन संस्थान, अहमदाबाद के प्रोफेसरों के एक समूह ने की थी। संगठन ने उसी वर्ष दिल्ली हाईकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल कर चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों की आपराधिक, वित्तीय और शैक्षणिक पृष्ठभूमि सार्वजनिक करने की मांग की थी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के 2002 और 2003 के फैसलों के आधार पर उम्मीदवारों के लिए इन जानकारियों का शपथपत्र के जरिए खुलासा करना अनिवार्य हुआ।

