हिजरी नए साल की शुरुआत, इबादत और गम के माहौल में मुहर्रम का आगाज, 10 मुहर्रम को यौमे आशूरा
बरेली : बरेली मरकज़ समेत उत्तर प्रदेश के कई जिलों में मुहर्रम का चांद दिखाई देने के साथ ही नए इस्लामी वर्ष की शुरुआत हो गई। दरगाह आला हजरत के मीडिया प्रभारी नासिर कुरैशी ने चांद दिखने की पुष्टि की है। इसके बाद मुहर्रम का महीना शुरू हो गया है। इसी के साथ 10 मुहर्रम यानी यौमे आशूरा 26 जून को मनाया जाएगा। चांद की तस्दीक के बाद मुस्लिम समुदाय में नए हिजरी साल के आगाज की तैयारियां शुरू हो गई हैं। मुहर्रम इस्लामी हिजरी कैलेंडर का पहला महीना है और इसे इस्लाम के चार पवित्र महीनों में विशेष स्थान प्राप्त है। इस महीने से इस्लामी नववर्ष की शुरुआत होती है। दुनिया भर के मुसलमान इस महीने को इबादत, आत्मचिंतन, सब्र और धार्मिक आस्था के साथ मनाते हैं।
चांद दिखने के साथ शुरू होता है नया हिजरी साल

इस्लाम में सभी प्रमुख पर्व और धार्मिक अवसर चंद्र कैलेंडर के अनुसार निर्धारित होते हैं। मुहर्रम की शुरुआत अमावस्या के बाद नए चांद (हिलाल) के दिखाई देने पर होती है। चांद दिखाई देने की स्थिति मौसम और भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग हो सकती है, इसलिए विभिन्न देशों और क्षेत्रों में मुहर्रम की शुरुआत अलग-अलग दिन हो सकती है। बरेली मरकज़ और प्रदेश के अन्य जिलों में चांद नजर आने के बाद नए हिजरी वर्ष का आगाज हो गया है। इसके साथ ही मस्जिदों, इमामबाड़ों और धार्मिक स्थलों पर विशेष कार्यक्रमों की तैयारियां भी शुरू हो गई हैं।
कर्बला की कुर्बानी की याद दिलाता है मुहर्रम

मुहर्रम का महीना विशेष रूप से कर्बला की उस ऐतिहासिक घटना की याद दिलाता है, जब 61 हिजरी (680 ईस्वी) में पैगंबर हजरत मुहम्मद साहब के नवासे हजरत इमाम हसन, इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों ने इराक के बगदाद शहर में स्थित कर्बला मैदान में सत्य, न्याय और इंसानियत की रक्षा के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी थी। इतिहास के अनुसार इमाम हुसैन ने तत्कालीन शासक यजीद की सत्ता को स्वीकार करने से इंकार कर दिया था। इसके बाद कर्बला में उन्हें और उनके साथियों को घेर लिया गया। कठिन परिस्थितियों और प्यास के बावजूद उन्होंने अन्याय के सामने झुकने के बजाय शहादत को चुना। उनकी यह कुर्बानी आज भी पूरी दुनिया में सत्य और इंसाफ की मिसाल मानी जाती है।
मजलिसों और धार्मिक कार्यक्रमों का होगा आयोजन
मुहर्रम के दौरान विभिन्न स्थानों पर मजलिस, तकरीर, मातमी कार्यक्रम और धार्मिक सभाएं आयोजित की जाती हैं। मुस्लिम समुदाय के लोग इमाम हुसैन और कर्बला के शहीदों की याद में श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। यौमे आशूरा के दिन विशेष रूप से रोजा, इबादत और दुआओं का महत्व बताया गया है। धार्मिक विद्वानों का कहना है कि मुहर्रम केवल शोक का महीना नहीं, बल्कि सत्य, धैर्य, त्याग और इंसानियत के मूल्यों को याद करने का अवसर भी है।
