कानपुर : कानपुर में किडनी रैकेट के खुलासे के बाद क्राइम ब्रांच और पुलिस की टीमें अब इस पूरे नेटवर्क की जड़ों तक पहुंचने में जुट गई हैं। मामले में गिरफ्तार आरोपी शिवम से घंटों पूछताछ की गई, जिसमें उसने इस काले कारोबार के कई चौंकाने वाले तरीके उजागर किए हैं। पूछताछ के दौरान सामने आया कि यह रैकेट बेहद सुनियोजित तरीके से काम करता था और इसमें कई स्तरों पर लोगों की भूमिका तय होती थी।
आरोपी ने बताया कि किडनी खरीद-फरोख्त के इस धंधे में सबसे पहले गरीब और मजबूर लोगों को निशाना बनाया जाता था। उन्हें यह कहकर फंसाया जाता था कि वे अपने परिवार के इकलौते सहारे हैं और अगर वे किडनी बेचते हैं तो उन्हें तुरंत पैसे मिल जाएंगे। वहीं दूसरी ओर, जिन मरीजों को किडनी की जरूरत होती थी, उनके परिजनों को मरीज की बिगड़ती हालत का डर दिखाकर जल्द से जल्द डोनर की व्यवस्था करने के लिए दबाव बनाया जाता था।
शक से बचने के लिए इस पूरे खेल को कानूनी दिखाने की कोशिश भी की जाती थी। आरोपी ने बताया कि किडनी देने वाले व्यक्ति को मरीज का रिश्तेदार बताया जाता था, ताकि ट्रांसप्लांट प्रक्रिया में कोई संदेह न हो। इसके बाद मरीज के परिजनों की आर्थिक स्थिति का आकलन किया जाता था और उसी हिसाब से उनसे कई गुना अधिक रकम वसूली जाती थी। इस तरह यह रैकेट जरूरतमंदों की मजबूरी का फायदा उठाकर मोटा मुनाफा कमाता था।
पुलिस की जांच में यह भी सामने आया है कि इस रैकेट के तार शहर के कई निजी अस्पतालों से जुड़े हो सकते हैं। खासतौर पर बर्रा, नौबस्ता, पनकी और कल्याणपुर जैसे इलाकों में स्थित कुछ अस्पतालों की भूमिका संदिग्ध मानी जा रही है। अब पुलिस इन अस्पतालों में हुए ट्रांसप्लांट और इलाज के रिकॉर्ड खंगाल रही है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि किन-किन मामलों में नियमों का उल्लंघन हुआ है।
जांच के दौरान एक और चौंकाने वाली बात सामने आई है कि मरीजों और डोनर को अस्पताल में भर्ती कराने के लिए फर्जी बीमारियों का सहारा लिया जाता था। मरीज को गॉल ब्लैडर, पथरी या आंतों की बीमारी बताकर भर्ती किया जाता था, जबकि असल में उसका किडनी ट्रांसप्लांट किया जाता था। वहीं डोनर को ऑपरेशन के बाद जल्दी छुट्टी दे दी जाती थी, जबकि किडनी लेने वाले मरीज को कई महीनों तक अस्पताल में रखा जाता था। इस दौरान हर बार उसकी नई बीमारी बताई जाती थी, ताकि किसी को शक न हो।
आरोपी शिवम की निशानदेही पर पुलिस को कई डॉक्टरों और नर्सिंग होम के नाम भी मिले हैं, जो इस रैकेट से जुड़े हो सकते हैं। पुलिस की टीमें अब इन सभी संदिग्धों से पूछताछ कर रही हैं और दस्तावेजों की जांच कर रही हैं। सूत्रों के मुताबिक, इस मामले की जांच के लिए पुलिस की टीमें पश्चिम बंगाल और हरियाणा भी भेजी गई हैं, जहां से किडनी खरीदने के लिए युवकों को लाया गया था।
पुलिस कमिश्नर रघुबीर लाल ने स्पष्ट किया है कि इस मामले में सामने आने वाले हर व्यक्ति की भूमिका की गहराई से जांच की जाएगी और किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा। उन्होंने कहा कि यह एक गंभीर अपराध है, जिसमें मानव जीवन के साथ खिलवाड़ किया गया है, इसलिए सख्त कार्रवाई की जाएगी।
गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब कानपुर में किडनी रैकेट का मामला सामने आया हो। करीब 22 साल पहले भी शहर में इसी तरह का एक मामला उजागर हुआ था, जिसमें एक पॉश इलाके के नर्सिंग होम और वहां कार्यरत सर्जन का नाम सामने आया था। उस समय भी आरोप था कि आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों को इलाज के नाम पर फंसाकर उनकी किडनी की जांच की जाती थी और बाद में उसे बेच दिया जाता था।
ताजा मामले ने एक बार फिर स्वास्थ्य व्यवस्था और निजी अस्पतालों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह घटना इस बात की ओर इशारा करती है कि किस तरह लालच और मुनाफे के लिए इंसानियत को दरकिनार किया जा रहा है। अब देखना होगा कि पुलिस इस रैकेट की कितनी गहराई तक पहुंच पाती है और इसमें शामिल लोगों पर क्या कार्रवाई होती है।
