नई दिल्ली : नई दिल्ली में चुनाव आयोग से जुड़े एक पुराने दस्तावेज को लेकर सियासी विवाद खड़ा हो गया है। मामला उस समय सामने आया जब सीपीआईएम ने सोशल मीडिया पर एक दस्तावेज साझा किया, जिसमें चुनाव आयोग के पत्र के साथ लगे हलफनामे पर भाजपा केरल की मुहर दिखाई दी। इस खुलासे के बाद विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
बताया जा रहा है कि यह मामला 19 मार्च 2019 के एक आधिकारिक पत्र से जुड़ा है, जो चुनाव आयोग द्वारा विभिन्न राजनीतिक दलों को भेजा गया था। सीपीआईएम का आरोप है कि इस पत्र के साथ जो दस्तावेज भेजा गया, उस पर चुनाव आयोग की बजाय भाजपा की मुहर लगी हुई थी। पार्टी का कहना है कि यह दस्तावेज कई राजनीतिक दलों तक पहुंचा और इसकी पुष्टि भी की गई है। इसके बाद यह सवाल खड़ा हो गया कि क्या चुनाव आयोग के दस्तावेजों में किसी तरह का बाहरी हस्तक्षेप हुआ है।
इस मुद्दे पर कांग्रेस ने भी कड़ी प्रतिक्रिया दी है। कांग्रेस ने इसे बेहद गंभीर मामला बताते हुए चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं। विपक्ष का कहना है कि अगर संवैधानिक संस्था के दस्तावेजों में इस तरह की गलती हो सकती है, तो यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए खतरे की घंटी है।
विवाद बढ़ने के बाद केरल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने सफाई देते हुए कहा कि यह पूरी तरह एक क्लेरिकल एरर, यानी मानवीय भूल है। अधिकारियों के मुताबिक, भाजपा केरल इकाई ने हाल ही में एक पुरानी गाइडलाइन की कॉपी जमा की थी, जिस पर उनकी मुहर पहले से लगी हुई थी। इसी कॉपी को गलती से अन्य राजनीतिक दलों को भेज दिया गया।
कार्यालय ने यह भी माना कि यह चूक अनजाने में हुई और समय पर इस पर ध्यान नहीं जा सका। हालांकि, जैसे ही मामला सामने आया, तुरंत कार्रवाई करते हुए 21 मार्च को एक नया पत्र जारी कर गलत दस्तावेज को वापस ले लिया गया। इसकी सूचना सभी राजनीतिक दलों, जिला चुनाव अधिकारियों और रिटर्निंग अधिकारियों को दे दी गई। चुनाव आयोग ने अपने बयान में कहा कि भविष्य में ऐसी गलती न हो, इसके लिए जरूरी सावधानियां बरती जाएंगी। आयोग का कहना है कि यह एक सामान्य मानवीय त्रुटि है, जिसे ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है।
हालांकि विपक्ष इस सफाई से संतुष्ट नहीं है। सीपीआईएम ने सवाल उठाया कि क्या अब चुनाव आयोग और भाजपा एक ही पावर सेंटर से संचालित हो रहे हैं। वहीं कांग्रेस ने भी पूछा कि चुनाव आयोग के पास भाजपा की मुहर लगी कॉपी कैसे पहुंची और उसे आधिकारिक दस्तावेज के साथ कैसे भेज दिया गया।
विपक्षी दलों का कहना है कि यह केवल एक छोटी गलती नहीं है, बल्कि इससे संस्थाओं की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। उनका मानना है कि इस पूरे मामले की पारदर्शी जांच होनी चाहिए और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए।
कुल मिलाकर यह मामला अब एक बड़े राजनीतिक विवाद में बदल चुका है। जहां एक ओर चुनाव आयोग इसे क्लेरिकल एरर बता रहा है, वहीं विपक्ष इसे लोकतंत्र और संस्थागत विश्वसनीयता से जुड़ा गंभीर मुद्दा मान रहा है। आने वाले समय में इस मुद्दे पर सियासी घमासान और बढ़ने की संभावना है।
