अंतर्राष्ट्रीय शायर प्रो.वसीम बरेलवी की यादों से निकला एक अज़ीम किरदार
जब शायरी सिर्फ़ एहसास नहीं, ज़िम्मेदारी बन जाए — जब लफ़्ज़ तख़्त-ओ-ताज को झुका दें और मोहब्बत इंकलाब की शक्ल ले ले — तब एक शख़्स उभरता है। जिसे हम कैफ़ी आज़मी कहते हैं। 10 मई की तारीख़ उर्दू अदब के उस सितारे की याद दिलाती है। जिसकी रौशनी वक़्त की गर्द को चीरती रही। उनकी पुण्यतिथि (वरसी) पर हम उन्हें महज़ एक शायर के तौर पर नहीं, बल्कि एक सोच, एक आंदोलन और एक जीवित आदर्श के रूप में याद करते हैं।
बरेली से मिजवां तक फैला एक वक़ार

कैफ़ी आज़मी को जब बरेली में वर्ष 1969-70 में यादगार-ए-ग़ालिब मुशायरे में बुलाया गया, तो बरेली की सरज़मीन ने उनका उसी इज़्ज़त से इस्तकबाल किया। जिसके वो हक़दार थे। लेकिन जो क़िस्सा अंतर्राष्ट्रीय शायर प्रो. वसीम बरेलवी की ज़ुबानी सामने आता है, वो बताते है कि उस दौर में एक शायर का मर्तबा क्या था। राजस्थान विधानसभा के तत्कालीन स्पीकर निरंजन नाथ आचार्य जब बरेली पहुंचे और उन्हें पता चला कि कैफ़ी आज़मी उसी गवर्नर सूट्स में ठहरे हैं, तो उन्होंने ना सिर्फ़ दूसरा कमरा चुना, बल्कि खुद उनके पाँव छूकर आशीर्वाद लिया। क्या यह सिर्फ़ एक शायर का सम्मान था? नहीं, यह उस रूहानी मशाल का एहतराम था, जो जमाने को रोशनी देती रही।
मौलवी बनने से इंकलाब तक

कैफ़ी आज़मी के वालिद चाहते थे कि बेटा दीनी तालीम हासिल कर मौलवी बने। मगर मिजवां के उस लड़के की तक़दीर में कुछ और ही लिखा था। 12 बरस की उम्र में जो ग़ज़ल लिखी, वह सीधे बेग़म अख़्तर की आवाज़ बन गई। और उसके बाद शब्द उनकी तलवार बन गए — और शायरी एक ज़रिया, जिससे उन्होंने औरत, मज़दूर, किसान, मज़लूम — सबकी आवाज़ बुलंद की।
शायरी जो जाग उठती थी

उनकी नज़्में किताबों में कैद रहने वाली नहीं थीं। “उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे” — जब उन्होंने ये लिखा, तो यह स्याही से ज़्यादा खून और जज़्बे का पैग़ाम बन गया। उन्होंने दिखाया कि कविता तब असली होती है, जब वह ज़मीर को झिंझोड़ दे।
मिजवां की मिट्टी से आख़िरी सलाम तक

अपने जीवन के उत्तरार्ध में उन्होंने मिजवां को संवारने में खुद को झोंक दिया। स्कूल, अस्पताल, सड़क — उन्होंने साबित किया कि कविता अगर खेतों की फसलों से न जुड़ सके, तो वह अधूरी रह जाती है।
परदे पर भी शब्दों की रूह
‘गर्म हवा’ जैसी फिल्मों में उन्होंने पटकथा से वही संवेदना रची, जो उनकी नज़्मों में बहती थी। “वक़्त ने किया क्या हसीं सितम” सिर्फ़ एक गीत नहीं, बल्कि वक़्त की क्रूरता और मोहब्बत की नर्मी का संगम था।
एक मोहब्बत, जो आंदोलन बनी
शौकत आज़मी से उनका रिश्ता भी इस बात की मिसाल है कि दो विचारशील इंसानों का मेल मोहब्बत से कहीं आगे, संघर्ष की साझेदारी होता है। निज़ाम के दरबार में जब उन्होंने बग़ावत की ग़ज़ल पढ़ी, तो वह आवाज़ शौकत के दिल तक भी पहुंची — और एक rebel poet को उसका हमसफ़र मिला।
आख़िरी अल्फ़ाज़, जो आज भी गूंजते हैं
2002 में जब उन्होंने “ये दुनिया, ये महफ़िल मेरे काम की नहीं” गुनगुनाया, तो वह बिदाई नहीं थी — वह एक मुकम्मल सफ़र का इज़हार था।
