मुहम्मद साजिद :
जब यूनानी दार्शनिक प्लेटो ने अपनी अमर कृति ‘रिपब्लिक’ में “दार्शनिक राजा” की परिकल्पना की थी, तो उसकी कल्पना में एक ऐसा शासक था, जो न केवल बुद्धिमान और न्यायप्रिय हो, बल्कि साहसी और संवेदनशील भी हो। भारत के इतिहास में यदि किसी शासक ने इस परिकल्पना को यथार्थ का रूप दिया, तो वह निःसंदेह छत्रपति शाहूजी महाराज थे। उनका मानना था कि शासन-प्रशासन में सामाजिक विविधता के बिना न्यायसंगत समाज की कल्पना अधूरी है। 26 जून 1874 को जन्म लेने वाले छत्रपति शाहूजी महाराज की आज यानी 6 मई को पुण्यतिथि है। उनका निधन 6 मई,1922 को हुआ था।
आरक्षण की बुनियाद और न्याय का साहसिक प्रारंभ
भारत में आरक्षण व्यवस्था के जनक छत्रपति शाहूजी महाराज हैं। उन्होंने 26 जुलाई 1902 को कोल्हापुर राज्य में 50 फीसद आरक्षण लागू कर आधुनिक भारत में सामाजिक न्याय की नींव रखी थी। यह कदम तब उठाया गया, जब शासन-प्रशासन में लगभग सम्पूर्ण नियंत्रण उच्च जातियों का था, और वंचित वर्ग शिक्षा, नौकरियों और राजनीतिक भागीदारी से दूर था। उन्होंने मराठा, कुनबी, दलित,मुस्लिम आदिवासी जैसे समुदायों को आरक्षण में शामिल कर एक समतामूलक व्यवस्था की दिशा में साहसिक पहल की। यह वह कार्य था। जिसे भारत सरकार ने स्वतंत्रता के दशकों बाद आंशिक रूप से अपनाया।
सामाजिक परिवर्तन के लिए शिक्षा को बताया शक्तिशाली चाबी
शाहूजी महाराज का विश्वास था कि शिक्षा ही सामाजिक परिवर्तन की कुंजी है। उन्होंने निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा लागू की, लड़कियों के लिए स्कूल खुलवाए और निम्न जातियों के बच्चों को छात्रवृत्तियाँ दीं। उस दौर में जब शिक्षा केवल सवर्णों तक सीमित थी। शाहूजी ने उसमें आमजन की भागीदारी सुनिश्चित की।
सामाजिक क्रांति के सच्चे सूत्रधार
उन्होंने अस्पृश्यता के विरुद्ध निर्णायक युद्ध छेड़ा। उन्होंने न सिर्फ इसे समाप्त करने के लिए प्रशासनिक आदेश दिए, बल्कि सरकारी कर्मचारियों के लिए सख्त दंड भी निर्धारित किए, जो भेदभाव करते पाए जाएं। बंधुआ मजदूरी, जातीय दासता और धार्मिक पाखंड के विरुद्ध उनकी लड़ाई न सिर्फ क्रांतिकारी थी, बल्कि भविष्यदर्शी भी। 1917 में धार्मिक स्थलों को राज्य नियंत्रण में लेकर उन्होंने पवित्रता की अवधारणा को समावेशी बनाया।
महिलाओं के अधिकारों की पहरेदारी
1911 में महिलाओं को विवाह, संपत्ति और दत्तक संतानों के मामलों में समान अधिकार देने वाला कानून पारित कर शाहूजी ने लैंगिक न्याय की ओर ठोस कदम बढ़ाया। यह कार्य स्वतंत्र भारत में डॉ. आंबेडकर के हिंदू कोड बिल के दशकों पूर्व किया गया प्रयास था।
शासक नहीं, जननायक बने
शाहूजी महाराज ने अपने शासन को सामाजिक न्याय, समावेशिता और शिक्षा आधारित विकास की प्रयोगशाला में बदल दिया। उन्होंने ब्रिटिश शासन द्वारा अपराधी करार दिए गए आदिवासियों को न केवल सम्मान दिलाया, बल्कि प्रशासन में भी स्थान देकर भारत की जातीय संरचना को चुनौती दी। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश पी. बी. सावंत ने अपनी किताब में उन्हें “जनता का राजा” कहना केवल एक प्रशंसा नहीं, बल्कि उनकी शासनशैली का सार बताया है।
