नई दिल्ली : पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले चल रहे मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर सियासी घमासान लगातार तेज होता जा रहा है। इस बीच अब सुप्रीम कोर्ट ने भी इस पूरे मामले में सख्त रुख अपनाया है। सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को पश्चिम बंगाल में एसआईआर को लेकर दाखिल की गई नई याचिकाओं पर चुनाव आयोग से जवाब तलब किया है।
ये याचिकाएं तृणमूल कांग्रेस के राज्यसभा सांसद डेरेक ओ ब्रायन और डोला सेन की ओर से दाखिल की गई हैं। याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि पश्चिम बंगाल में चल रही मतदाता सूची संशोधन प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर मनमानी और नियमों की अनदेखी की जा रही है। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ के समक्ष हुई। कोर्ट ने आरोपों को गंभीर मानते हुए चुनाव आयोग को एक सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। इस मामले में अगली सुनवाई 19 जनवरी को तय की गई है।
सुनवाई के दौरान टीएमसी सांसद डेरेक ओ ब्रायन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कोर्ट को बताया कि चुनाव आयोग अपने निर्देश व्हाट्सऐप जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए दे रहा है। उन्होंने कहा कि बूथ लेवल ऑफिसर बिना किसी लिखित आदेश के काम कर रहे हैं, जिससे पूरी प्रक्रिया की वैधता पर सवाल खड़े होते हैं। कपिल सिब्बल ने यह भी आरोप लगाया कि चुनाव आयोग ने ‘तार्किक विसंगति’ नाम से मतदाताओं की एक नई श्रेणी बना दी है, जिसका कोई लिखित नियम या अधिसूचना नहीं है। इसी आधार पर लाखों मतदाताओं को नोटिस भेजे जा रहे हैं और उन्हें सुनवाई के लिए बुलाया जा रहा है।
याचिका में यह भी दावा किया गया है कि 16 दिसंबर 2025 को प्रकाशित ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से करीब 58 लाख मतदाताओं के नाम बिना किसी पूर्व नोटिस के हटा दिए गए। इसके अलावा लगभग 1.36 करोड़ मतदाताओं को नोटिस भेजने की तैयारी की गई, जिसे याचिकाकर्ताओं ने पूरी तरह अव्यवस्थित और गैरकानूनी बताया है।
टीएमसी सांसदों ने आरोप लगाया कि इस प्रक्रिया से आम लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। बुजुर्गों, दिव्यांगों और गंभीर रूप से बीमार लोगों को जबरन सुनवाई के लिए बुलाया जा रहा है। लंबी-लंबी कतारें लग रही हैं, दस्तावेजों को लेकर भ्रम की स्थिति बनी हुई है और नोटिस में साफ तौर पर कारण भी नहीं बताया जा रहा। इसके साथ ही राजनीतिक दलों के बूथ एजेंटों को मतदाताओं की मदद करने से रोका जा रहा है। याचिका में सुप्रीम कोर्ट से मांग की गई है कि 15 जनवरी 2026 को दावों और आपत्तियों की अंतिम तारीख को आगे बढ़ाया जाए। व्हाट्सऐप या मौखिक निर्देशों को अवैध घोषित किया जाए और चुनाव आयोग को हर आदेश लिखित रूप में जारी करने का निर्देश दिया जाए। याचिका में यह भी कहा गया है कि मतदाता सूची में नाम होना नागरिक का संवैधानिक और कानूनी अधिकार है और इससे जुड़ी पूरी प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और कानून के अनुसार होनी चाहिए।
गौरतलब है कि इससे पहले पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी एसआईआर के खिलाफ अदालत जाने का ऐलान कर चुकी हैं। ममता बनर्जी ने आरोप लगाया है कि इस प्रक्रिया के कारण लोगों में डर, उत्पीड़न और प्रशासनिक मनमानी बढ़ी है, जिसके चलते मौत, अस्पताल में भर्ती होने और आत्महत्या के प्रयास जैसी घटनाएं सामने आई हैं।
