नई दिल्ली : संसद ने बुधवार को देश के कानून व्यवस्था में एक अहम और ऐतिहासिक कदम उठाते हुए 71 पुराने और अप्रासंगिक कानूनों को रद्द या संशोधित करने वाले ‘निरसन एवं संशोधन विधेयक 2025’ को मंजूरी दे दी है। यह विधेयक पहले लोकसभा में पारित हो चुका था और अब राज्यसभा ने भी इसे ध्वनि मत से स्वीकृति दे दी। विधेयक पेश करते हुए केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने कहा कि सरकार का उद्देश्य केवल ईज ऑफ डूइंग बिजनेस तक सीमित नहीं है, बल्कि ईज ऑफ लिविंग यानी आम नागरिकों का जीवन आसान बनाना भी सरकार की प्राथमिकता है। उन्होंने कहा कि समय के साथ कई कानून अप्रासंगिक हो चुके हैं या उनमें तकनीकी और व्यावहारिक खामियां हैं, जिन्हें हटाना जरूरी था।
कानून मंत्री ने भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 का उदाहरण देते हुए कहा कि पहले कुछ धर्मों के लोगों को वसीयत के लिए अदालत से सत्यापन कराना पड़ता था, जबकि मुसलमानों पर यह नियम लागू नहीं था। उन्होंने स्पष्ट किया कि संविधान धर्म, जाति और लिंग के आधार पर भेदभाव की अनुमति नहीं देता, और सरकार संविधान के अनुरूप ही कानूनों में सुधार कर रही है। मेघवाल ने इन बदलावों को औपनिवेशिक सोच से मुक्ति की दिशा में बड़ा कदम बताया।
हालांकि, विधेयक पर विपक्ष ने सवाल भी उठाए। कांग्रेस सांसद विवेक के. तन्खा ने सरकार के दावों से असहमति जताते हुए कहा कि यह प्रक्रिया केवल कागजी सुधार तक सीमित है और इसके वास्तविक प्रभावों का जमीनी स्तर पर समुचित आकलन नहीं किया गया है। उन्होंने कहा कि कानूनों को हटाने के साथ-साथ उनके सामाजिक और लोकतांत्रिक प्रभावों की भी समीक्षा होनी चाहिए।
इस विधेयक के तहत 71 कानूनों को पूरी तरह निरस्त किया गया है। इनमें भारतीय ट्रामवे अधिनियम 1886, लेवी चीनी मूल्य समतुल्यकरण निधि अधिनियम 1976 और बीपीसीएल कर्मचारियों की सेवा शर्तों से जुड़ा अधिनियम 1988 जैसे कानून शामिल हैं।
इसके अलावा चार महत्वपूर्ण कानूनों में संशोधन किया गया है, जिनमें सामान्य खंड अधिनियम 1897, सिविल प्रक्रिया संहिता 1908, भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम 1925 और आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 शामिल हैं। कानून मंत्री ने जानकारी दी कि 2014 के बाद से अब तक 1,577 पुराने कानूनों पर कार्रवाई की जा चुकी है, जिनमें से 1,562 कानून पूरी तरह रद्द किए गए हैं, जबकि 15 कानूनों को संशोधित कर नए रूप में लागू किया गया है।
इस अहम विधेयक पर हुई चर्चा में भाजपा, कांग्रेस, टीएमसी, डीएमके, वाईएसआरसीपी, बीजेडी, एआईएडीएमके, सीपीआई(एम), आईयूएमएल, बसपा, आम आदमी पार्टी सहित कई दलों के सांसदों ने हिस्सा लिया। जहां कुछ सांसदों ने इसे आम जनता के लिए राहत भरा कदम बताया, वहीं कुछ ने नागरिक अधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिहाज से और गहन समीक्षा की आवश्यकता पर जोर दिया।
