ICAR-IVRI में राष्ट्रीय सम्मेलन, भैंस को बताया ‘ब्लैक गोल्ड’, 50 फीसद से अधिक दूध उत्पादन में योगदान
बरेली : ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था में भैंस आधारित पशुधन प्रणाली आज एक सहायक नहीं, बल्कि मुख्य स्तंभ बन चुकी है, लेकिन जलवायु परिवर्तन इस क्षेत्र के लिए सबसे बड़ी चुनौती के रूप में सामने आया है। यह बात आईसीएआर-भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई), इज्जतनगर में आयोजित इंडियन सोसायटी फॉर बफैलो डेवलपमेंट (ISBD) के राष्ट्रीय सम्मेलन में मुख्य अतिथि डॉ. केएमएल पाठक, पूर्व महानिदेशक (पशु विज्ञान), आईसीएआर एवं पूर्व कुलपति दुवासू, मथुरा ने कही। डॉ. पाठक ने कहा कि भैंस आधारित अर्थव्यवस्था ग्रामीण भारत की चालक शक्ति बन चुकी है। भैंस न केवल नियमित आय और पोषण का साधन है, बल्कि रोजगार सृजन में भी इसकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने चेतावनी दी कि जलवायु परिवर्तन अब कोई भविष्य की आशंका नहीं, बल्कि एक प्रमाणित वास्तविकता है, जिससे भैंसें अत्यधिक प्रभावित हो रही हैं। ऐसे में जलवायु-सहिष्णु भैंस उत्पादन मॉडल विकसित करना समय की मांग है।
दूध उत्पादन में भारत नंबर-1, भैंस का योगदान 50 फीसद से अधिक

डॉ. पाठक ने बताया कि भारत विश्व में लगातार कई वर्षों से दुग्ध उत्पादन में प्रथम स्थान पर है, और इसमें भैंस के दूध का योगदान 50 प्रतिशत से अधिक है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भैंस का दूध भी A2 श्रेणी का होता है, जिसे लेकर पहले भ्रम की स्थिति थी। आज भैंस को “ब्लैक गोल्ड”कहा जा रहा है, जो छोटे और सीमांत किसानों की आजीविका का प्रमुख आधार है। उन्होंने चिंता जताई कि हरियाणा और पंजाब जैसे प्रमुख प्रजनन क्षेत्रों में भैंसों की संख्या में गिरावट देखी जा रही है, जो गंभीर संकेत है। इसके समाधान के लिए नीति निर्माताओं, वैज्ञानिकों और प्रसार तंत्र के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता है।
आईवीआरआई पशु चिकित्सा विज्ञान का धर्म स्थल

डॉ. पाठक ने आईवीआरआई को पशु चिकित्सा विज्ञान का धर्मस्थल बताते हुए कहा कि इस संस्थान ने देश की पशु विज्ञान अनुसंधान परंपरा को दिशा दी है। उन्होंने निदेशक प्रो.डॉ. त्रिवेणी दत्त के नेतृत्व में आईवीआरआई में हो रहे शैक्षणिक, अधोसंरचना, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और अनुसंधान विस्तार की सराहना की। उन्होंने NAAC द्वारा प्रदत्त A++ ग्रेड को संस्थान के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि बताया।
चार प्रमुख पशु रोगों का उन्मूलन, राष्ट्रीय जिम्मेदारी निभा रहा आईवीआरआई
इस अवसर पर आईवीआरआई के निदेशक एवं कुलपति प्रो.डॉ. त्रिवेणी दत्त ने कहा कि संस्थान ने देश से चार प्रमुख पशु रोगों और वैश्विक स्तर पर एक रोग के उन्मूलन में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। उन्होंने बताया कि आईवीआरआई प्रधानमंत्री राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम को तकनीकी सहयोग, टीकों की आपूर्ति, जैविक उत्पादों की गुणवत्ता जांच और क्षमता निर्माण के माध्यम से समर्थन दे रहा है। उन्होंने कहा कि आईवीआरआई देश में 12 महत्वपूर्ण जैविक उत्पादों की नियमित आपूर्ति कर रहा है, जिनमें मानव रोगों से जुड़े जैविक उत्पाद भी शामिल हैं।वन्यजीव स्वास्थ्य के क्षेत्र में संस्थान को राष्ट्रीय संदर्भ केंद्र का दर्जा प्राप्त है।
नई शिक्षा नीति के अनुरूप 80 से अधिक कोर्स

प्रो. दत्त ने बताया कि आईवीआरआई 1983 से डीम्ड यूनिवर्सिटी के रूप में कार्यरत है। वर्तमान में यूजी, पीजी, पीएचडी, बीटेक, एमबीए, बायोइन्फॉर्मेटिक्स सहित अनेक पाठ्यक्रम संचालित हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप 80 से अधिक डिप्लोमा, प्रमाणपत्र और व्यावसायिक पाठ्यक्रम शुरू किए गए हैं। ओपन और ऑनलाइन शिक्षा के माध्यम से भी संस्थान अपनी पहुंच बढ़ा रहा है।
150 से अधिक प्रतिभागियों की भागीदारी

आईएसबीडी के अध्यक्ष एवं बिहार पशु विज्ञान विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. इंद्रजीत सिंह ने भैंस विकास के लिए शोध, नीति, उद्योग और किसानों के बीच सशक्त सहयोग पर बल दिया। आयोजन सचिव डॉ. ज्ञानेंद्र सिंह ने बताया कि सम्मेलन में देश के विभिन्न राज्यों से 150 से अधिक वैज्ञानिक, किसान और विशेषज्ञ भाग ले रहे हैं। सम्मेलन में जलवायु -संवेदनशील प्रजनन, स्वास्थ्य प्रबंधन, पोषण और प्रिसीजन उत्पादन तकनीकों पर गहन विचार-विमर्श किया जा रहा है।कार्यक्रम का संचालन डॉ. अंशुक शर्मा और डॉ. मीमांशा शर्मा ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. हरी अब्दुल समद ने दिया। इस अवसर पर संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक, अधिकारी और पूर्व निदेशक भी मौजूद रहे।
