16 अक्टूबर के राज्यसभा चुनाव के बाद यूपी में BSP का लोकसभा,राज्यसभा,विधानसभाऔर विधान परिषद में प्रतिनिधित्व नहीं रहेगा
मुहम्मद साजिद
लखनऊ : उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुजन समाज पार्टी यानी BSP का दौर एक बड़े राजनीतिक बदलाव के मुहाने पर खड़ा है। कभी उत्तर प्रदेश की सत्ता पर पूर्ण बहुमत के साथ काबिज रही बसपा अब ऐसी स्थिति में पहुंच गई है, जहां 16 अक्टूबर 2026 के राज्यसभा चुनाव के बाद देश और यूपी के चारों सदनों लोकसभा,राज्यसभा, विधानसभा और विधान परिषद में उसका कोई प्रतिनिधि नहीं रहेगा। हालांकि, पंजाब और बिहार में एक-एक विधायक है।राज्यसभा की 10 सीटों के लिए 16 अक्टूबर को मतदान होना है।इनमें मौजूदा तौर पर आठ सीटें बीजेपी, एक समाजवादी पार्टी और एक बसपा के पास है। बसपा के राज्यसभा सदस्य रामजी गौतम का कार्यकाल समाप्त होने के बाद पार्टी के पास यूपी कोटे से राज्यसभा में भी कोई सीट नहीं बचेगी। निर्वाचन आयोग ने 16 अक्टूबर को मतदान और मतगणना का कार्यक्रम घोषित किया है।
कभी यूपी की सत्ता पर था BSP का दबदबा
बसपा का मौजूदा राजनीतिक आंकड़ा उसके इतिहास के मुकाबले बिल्कुल अलग तस्वीर पेश करता है। कांशीराम के नेतृत्व में बहुजन आंदोलन से निकली बसपा ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में धीरे-धीरे अपना प्रभाव बढ़ाया। मायावती के नेतृत्व में पार्टी ने कई बार प्रदेश की सत्ता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और 2007 में पहली बार अपने दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। 2007 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने 403 में से 206 सीटें जीती थीं और उसका वोट शेयर करीब 30.43 प्रतिशत रहा था। यही वह चुनाव था जब पार्टी ने दलित आधार के साथ-साथ सामाजिक समीकरणों का विस्तार करते हुए व्यापक सामाजिक गठजोड़ बनाया। हालांकि, BSP का विधानसभा सफर 2007 में सबसे अहम था। इस चुनाव में 30.43% मत लेकर 206 सीट जीती थी। इसके बाद 2012 में 80, और वोट रह गया था, 25.95%। इसके बाद 2017 में 19 सीट ही जीत पाई थी। इस चुनाव में वोट घटकर 22.23% रह गया था। 2022 विधानसभा चुनाव में 12.88%फीसद वोट लेकर सिर्फ एक सीट ले सकी। हालांकि, एक मात्र विधायक की भी मौत हो गई।
सपा के साथ गठबंधन से मिला बल
2007 से 2022 के बीच बसपा ने 205 विधानसभा सीटें गंवाईं, और उसका वोट शेयर लगभग आधा रह गया। लोकसभा चुनाव 2024 में भी खाता नहीं खुला हालांकि,2019 में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में बसपा ने उत्तर प्रदेश की 10 लोकसभा सीटें जीती थीं और उसका वोट शेयर करीब 19.43% था, लेकिन 2024 में पार्टी एक भी लोकसभा सीट नहीं जीत सकी और उसका वोट शेयर 9.39% रह गया। यानी 2019 से 2024 के बीच बसपा का यूपी लोकसभा वोट शेयर करीब 10 प्रतिशत अंक घटा। यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है। क्योंकि, बसपा का सबसे बड़ा राजनीतिक आधार लंबे समय से दलित वोट, विशेषकर जाटव मतदाताओं के बीच रहा है। लेकिन पिछले कुछ चुनावों के आंकड़े बताते हैं कि पार्टी का कुल वोट शेयर लगातार नीचे गया है।
2027 से पहले सबसे बड़ा सवाल,वोट बैंक कितना बचा?
यहीं से 2027 विधानसभा चुनाव बसपा के लिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं। यह कहना जल्दबाजी होगी कि 2027 में बसपा का वोट कितना रहेगा या कितनी सीटें मिलेंगी। अभी चुनाव हुआ नहीं है। लेकिन पिछले चुनावों के आंकड़ों से एक स्पष्ट ट्रेंड जरूर दिखाई देता है। 2007 में 30.43%, 2012 में 25.95%, 2017 में 22.23%, 2022 में 12.88%, 2024 लोकसभा में 9.39% इन आंकड़ों को विधानसभा और लोकसभा चुनावों के बीच सीधे-सीधे एक समान पैमाने पर नहीं रखा जा सकता। क्योंकि, दोनों चुनावों के मुद्दे, गठबंधन और उम्मीदवार अलग होते हैं। फिर भी ये आंकड़े बसपा के बदलते चुनावी प्रदर्शन को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं।BSP के लिए सिर्फ सीट नहीं, वोट प्रतिशत भी बड़ा मुद्दा है।
16 अक्टूबर का राज्यसभा चुनाव क्यों महत्वपूर्ण?
यूपी की 10 राज्यसभा सीटों के चुनाव में विधानसभा के मौजूदा सदस्य मतदान करेंगे। निर्वाचन आयोग के अनुसार यूपी विधानसभा में कुल 403 सीटें हैं।मौजूदा रिक्तियों के कारण प्रभावी संख्या 397 बताई जा रही है। इस आधार पर 10 सीटों के चुनाव में एक सीट के लिए आवश्यक कोटा 37 प्रथम वरीयता वोट बनता है। मौजूदा विधानसभा गणित में एनडीए के पास करीब 294 विधायक और सपा के पास करीब 101 विधायक बताए जा रहे हैं। 1 राज्यसभा सीट को 37 वोट यानी 37 विधायक चाहिए होते थे।एनडीए के 294 विधायकों में दो वोट की कमी है, जबकि जनसत्ता दल के दो विधायकों का समर्थन मिलने की स्थिति में आठ सीटों का गणित पूरा हो सकता है। सपा के 101 विधायक दो सीटों के लिए आवश्यक 74 वोट से अधिक संख्या रखते हैं। यह मौजूदा संख्या पर आधारित चुनावी गणित है, अंतिम परिणाम नहीं। नामांकन, उम्मीदवारों और मतदान के दौरान समीकरण बदल सकते हैं।
2027 BSP के लिए क्यों अहम?
2027 का विधानसभा चुनाव बसपा के लिए इसलिए महत्वपूर्ण होगा क्योंकि यह सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संगठनात्मक आधार की अगली परीक्षा भी होगा। पार्टी के सामने कई सवाल होंगे। बसपा का पारंपरिक आधार दलित राजनीति रहा है। ऐसे में 2027 में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह वोट किस हद तक पार्टी के साथ बना रहता है।
