नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट्स में फैसले सुनाने और उन्हें सार्वजनिक करने में हो रही देरी पर गहरी नाराजगी जताई है। शीर्ष अदालत ने इसे न्याय व्यवस्था की एक “पहचान योग्य बीमारी” करार देते हुए कहा कि अब इसे जड़ से खत्म करना जरूरी हो गया है। कोर्ट ने दो टूक कहा कि समय पर न्याय न मिलना, न्याय से वंचित किए जाने के समान है और यह स्थिति स्वीकार्य नहीं हो सकती।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली भी शामिल थे, झारखंड हाईकोर्ट से जुड़े एक मामले की सुनवाई कर रही थी। याचिका में कहा गया कि हाईकोर्ट ने 4 दिसंबर 2025 को याचिका खारिज करने का मौखिक आदेश तो सुना दिया, लेकिन महीनों बीत जाने के बावजूद उसका लिखित फैसला अब तक अपलोड नहीं किया गया। इसी देरी को लेकर याचिकाकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की ओर से पेश वकील से सख्त सवाल करते हुए कहा कि इस तरह की देरी का कोई तर्क या औचित्य नहीं है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि पूरा लिखित फैसला अगले सप्ताह के अंत तक संबंधित वकील को उपलब्ध कराया जाए। साथ ही, इस मामले को 16 फरवरी से शुरू होने वाले सप्ताह में दोबारा सूचीबद्ध करने का आदेश दिया गया।
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने इस मुद्दे पर स्पष्ट शब्दों में कहा कि न्यायपालिका के भीतर इस समस्या को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि कुछ जज बेहद मेहनती होते हैं और कई मामलों की सुनवाई के बाद फैसले सुरक्षित रखते हैं, लेकिन फिर लंबे समय तक निर्णय नहीं देते। यह किसी एक जज पर व्यक्तिगत आरोप नहीं है, बल्कि पूरी न्याय प्रणाली के सामने एक गंभीर चुनौती है। सीजेआई ने इसे “बीमारी” बताते हुए कहा कि इसे फैलने नहीं दिया जा सकता।
सीजेआई ने यह भी चिंता जताई कि कई मामलों में बहस पूरी हो जाने के बावजूद केस को बार-बार आगे के निर्देशों के लिए सूचीबद्ध किया जाता है, जिससे अनावश्यक मुकदमेबाजी बढ़ती है और पक्षकारों को मानसिक व आर्थिक परेशानी झेलनी पड़ती है। अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट जज के रूप में अपने 15 वर्षों के कार्यकाल में उन्होंने कभी भी फैसला सुरक्षित रखकर तीन महीने से अधिक समय तक लंबित नहीं रखा।
इस मामले में याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने भी सख्त टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है मानो केवल औपचारिकता निभाई जा रही हो। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि न्यायपालिका की गरिमा बनाए रखने के लिए एक सख्त संदेश जाना बेहद जरूरी है। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने यह भी स्पष्ट किया कि वह इस मुद्दे को सभी हाईकोर्ट्स के मुख्य न्यायाधीशों की आगामी बैठक में उठाएंगे। उन्होंने कहा कि इस समस्या पर गंभीर चर्चा कर ऐसा समाधान निकाला जाएगा, जिससे टाली जा सकने वाली कानूनी कार्यवाहियां खत्म हों और आम जनता को समय पर न्याय मिल सके।
गौरतलब है कि इससे पहले नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाईकोर्ट्स को निर्देश दिया था कि वे आरक्षित फैसलों से संबंधित विस्तृत रिपोर्ट सौंपें, जिसमें फैसला सुरक्षित रखने की तारीख, सुनाए जाने की तारीख और अपलोड करने की तारीख स्पष्ट रूप से दर्ज हो। सुप्रीम कोर्ट इन निर्देशों के अनुपालन की लगातार निगरानी कर रहा है।
