क्रांति से पहले के क्रांतिकारी,धार्मिक विद्वान ही नहीं, बल्कि एक इंकलाबी शख़्सियत
दिल्ली के नामवर आलिम-ए-दीन और मुहद्दिस शाह वलीउल्लाह देहलवी (1703-1762) को अक्सर सिर्फ़ धार्मिक विद्वान और “हुज्जतुल्लाहुल-बालिग़ा” जैसी मशहूर किताब के लेखक के तौर पर याद किया जाता है, लेकिन हक़ीक़त ये है कि वे महज़ एक आलिम नहीं बल्कि ब्रिटिश हुकूमत और सामंती जुल्मों के खिलाफ पहले इंकलाबी आवाज़ उठाने वालों में से एक थे।”हुज्जतुल्लाहुल-बालिग़ा”, “अल-क़ौलुल जली”, और डॉ. मुहम्मद उमर की किताब “शाह वलीउल्लाह और उनका दौर” में उनकी जंग-ए-आजादी में भूमिका के बारे में विस्तार लिखा है। इन किताबों के मुताबिक 1707 के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने दिल्ली समेत देश भर कब्जा जमाना शुरू कर दिया। शाह वलीउल्लाह देहलवी की जिंदगी में उनकी आंखों के सामने वतन की बर्बादी और दर्दनाक हालत ने उन्हें परेशानी में डाल दिया। उनसे वतन की परेशानी देखी नहीं जा रही थी। जुल्म ज्यादतियां बढ़ गई थी। ऐसे में उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ फतवा दिया। यह फतवा फारसी भाषा में दिया गया। यह फतवा हिंदुस्तान की आजादी की जंग में शुरुआती नुक्ता बना।
बिना ऑर्डर के अग्रेंज अफसरों की जुल्म ज्यादतियां
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फतवे में लिखा कि अग्रेंज अफसर बिना आदेशों (ऑर्डर) के बिना ही रोक-टोक के जुल्म ज्यादतियां कर रहे हैं। हिंदुस्तानियों को आपस में लड़ा रहे हैं, और धार्मिक आजादी छीनने की कोशिश में हैं। इसके बाद बड़ी संख्या में लोग ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ एकत्र होने लगे।
यूपी के मुजफ्फरनगर में जन्म
“आजादी के आंदोलन में कुर्बानियां” नामक किताब लिखने वाले डॉक्टर प्रोफेसर डॉ. रजी अहमद कमल की किताब के मुताबिक 21 फरवरी 1703 को मुज़फ्फरनगर (उत्तर प्रदेश) में जन्मे शाह वलीउल्लाह, दिल्ली के मशहूर आलिम शाह अब्दुर्रहीम देहलवी के बेटे थे। बचपन में ही क़ुरआन हिफ़्ज़ करने के बाद उन्होंने हदीस, तफ़्सीर और फ़िक़्ह में महारत हासिल की। 1728 में हज के लिए मक्का पहुँचे, और वहाँ के आलिम-ए-दीन से इल्म हासिल किया।
विदेशी ताक़तों, और भ्रष्ट निज़ाम का विरोध करने का ऐलान
ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ पहला फतवा जारी कर विदेशी ताक़तों, और भ्रष्ट निज़ाम का विरोध करने का ऐलान किया। उस वक्त ईस्ट इंडिया कंपनी धीरे-धीरे दिल्ली के दरबार और सूबों पर क़ब्ज़ा करने लगी। शाह वलीउल्लाह ने इस हालात को सिर्फ़ मज़हबी नहीं बल्कि सियासी और इंकलाबी मसला समझा। उन्होंने सबसे पहले ब्रिटिश हुकूमत और जाबिर शासकों के खिलाफ “फ़तवा” जारी किया। इसमें मुस्लिम शासकों और अवाम से अपील की कि वो विदेशी ताक़तों और भ्रष्ट निज़ाम का विरोध कर मुकाबला करें।
इंकलाबी सोच, और विरासत
शाह वलीउल्लाह का मानना था कि समाज में न्याय और बराबरी तभी कायम हो सकती है, जब धर्म, राजनीति और समाज सुधार एक साथ चलें। उनका “फ़तवा -ए-आलमगीरी” सिर्फ़ धार्मिक ग्रंथ नहीं बल्कि सामाजिक और राजनीतिक मसलों पर राय का संकलन था। उन्होंने समाज में फैली बुराइयों, सामंती शोषण और विदेशी गुलामी के खिलाफ आवाज़ बुलंद की।
समाज सुधार और इंकलाब को धर्म से जोड़ा
शाह वलीउल्लाह पहले भारतीय आलिम थे। जिन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ स्पष्ट राय दी। उन्होंने क़ुरआन का फ़ारसी में तर्जुमा किया, ताकि आम जनता समझ सके। उन्होंने समाज सुधार और इंकलाब को धर्म से जोड़ा, और फ्रांस और रूस की क्रांतियों से पहले ही उन्होंने हिंदुस्तान में इंकलाब की बुनियाद रखी थी। इसके बाद ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ देश में माहौल बनने लगा था।
