1962, 1978 और 1987 में रावण की भूमिका निभाने वाले कलाकारों ने लीला के दौरान गंवाई जान, 150 साल से अधिक पुरानी रामलीला की अनोखी घटनाएं आज भी लोगों के बीच चर्चा का विषय
पीलीभीत। जिले के बीसलपुर की ऐतिहासिक रामलीला अपनी अनूठी परंपराओं और लंबे इतिहास के लिए जानी जाती है। यहां रावण वध के मंचन के दौरान अलग-अलग वर्षों में रावण का किरदार निभाने वाले तीन कलाकारों की मौत हो गई थी। इन घटनाओं के चलते इस रामलीला को लेकर लोगों के बीच कई तरह की चर्चाएं होती रही हैं। स्थानीय स्तर पर इसे कई बार ‘सच्ची रामलीला’ भी कहा जाता है। हालांकि, इन घटनाओं को लेकर प्रचलित मान्यताओं और वास्तविक परिस्थितियों के बीच अंतर समझना जरूरी है।
1962, 1978 और 1987 में हुई थीं तीन घटनाएं
रामलीला के इतिहास से जुड़ी जानकारी के अनुसार, वर्ष 1962 में विजयदशमी के दिन रावण की भूमिका निभा रहे मुंशी छेदालाल का लीला परिसर में निधन हो गया था। इसके बाद वर्ष 1978 में रावण का किरदार निभाने वाले मोती महाराज की भी दशहरा के दिन मेला मैदान में रावण वध के मंचन के दौरान मौत हो गई। वर्ष 1987 में रावण की भूमिका निभा रहे कल्लूमल उर्फ गंगा विष्णु के साथ भी रावण वध की लीला के दौरान ऐसी ही घटना हुई। इन तीनों घटनाओं ने बीसलपुर की रामलीला को अलग पहचान दी। बताया जाता है कि इन घटनाओं के हजारों दर्शक गवाह बने थे। इन कलाकारों की स्मृति में मेला मैदान में रावण के रूप वाली प्रतिमा भी स्थापित की गई है।
डेढ़ सौ साल से अधिक पुरानी है बीसलपुर की रामलीला
बीसलपुर रामलीला मेले का इतिहास 150 साल से अधिक पुराना बताया जाता है। यहां रामलीला किसी सीमित मंच पर नहीं, बल्कि बड़े मैदान में आयोजित की जाती है। इसकी शैली वाराणसी के रामनगर की रामलीला से मिलती-जुलती बताई जाती है। शुरुआती वर्षों में मेला चंदे से आयोजित होता था। बाद में मेला कमेटी ने इसकी जिम्मेदारी संभाली। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, कमेटी के पास लगभग 100 बीघा से अधिक जमीन है। परिसर में अयोध्या, अशोक वाटिका, लंका, पंचवटी, भरत कुटी, सीता कुटी और शिव कुटी जैसे स्थलों के पक्के भवन बने हुए हैं। इन्हीं स्थानों पर रामायण के अलग-अलग प्रसंगों का मंचन किया जाता है।
एक महीने तक चलता है मेला, उमड़ती है बड़ी भीड़
बीसलपुर का रामलीला मेला हर साल शरद ऋतु में शुरू होकर करीब एक महीने तक चलता है। रावण वध, राम बरात और राजगद्दी के प्रसंग देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु और दर्शक पहुंचते हैं। इन प्रमुख आयोजनों के दौरान लगभग एक लाख लोगों की भीड़ जुटने का दावा किया जाता है। मेले में अखिल भारतीय कवि सम्मेलन और मुशायरे का आयोजन भी किया जाता है। इस रामलीला की एक और खासियत पात्रों की परंपरा है। जानकारी के मुताबिक, रावण और उसके दल के पात्रों को छोड़कर अन्य भूमिकाएं ब्राह्मण कलाकार निभाते हैं। सीता, मंदोदरी, सूपर्णखा, कैकेयी, कौशल्या, सुमित्रा, शबरी और उर्मिला जैसे महिला पात्रों की भूमिकाएं भी पुरुष कलाकार ही निभाते हैं। तीन कलाकारों की मौत से जुड़ी घटनाओं ने बीसलपुर की रामलीला को एक अलग पहचान दी है। वहीं, डेढ़ सदी से अधिक समय से चली आ रही इसकी परंपराएं आज भी क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत का अहम हिस्सा बनी हुई हैं।
