23 जनवरी 1897 को ओडिशा के कटक में जन्मे नेताजी सुभाष चंद्र बोस भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे प्रखर और साहसी नेताओं में से एक थे। आज उनकी वरसी (पुण्यतिथि) है। महज 23 वर्ष की उम्र में भारतीय सिविल सेवा (ICS) परीक्षा में देश में चौथा स्थान पाने वाले बोस ने ब्रिटिश शासन के लिए काम करने के बजाय अपने देश की आज़ादी को चुना। उनका कहना था “आजादी दी नहीं जाती-ली जाती है।”
महात्मा गांधी को दिया राष्ट्रपिता का खिताब
सुगाता बोस ने वर्ष 2011 में हावर्ड यूनिवर्सिटी में आयोजित प्रेस कांग्रेस में मीडिया को बताया था कि 1944 में सिंगापुर रेडियो से प्रसारित भाषण में नेताजी ने पहली बार महात्मा गांधी को “राष्ट्रपिता” कहकर संबोधित किया। यह संबोधन न केवल भारत में, बल्कि दुनिया भर में गांधी जी की पहचान का हिस्सा बन गया।
1943 में आजाद हिंद फौज की स्थापना
1943 में जापान के सहयोग से नेताजी ने आज़ाद हिंद फौज (INA) की स्थापना की। यह ब्रिटिश शासन के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष के लिए समर्पित थी। उनका प्रसिद्ध नारा “दिल्ली चलो” लाखों भारतीयों के दिल में आग बनकर दौड़ गया था।
आजाद हिंद रेडियो से अंग्रेजों के खिलाफ प्रचार
नेताजी ने जर्मनी, जापान और सोवियत संघ जैसे देशों का समर्थन हासिल किया। जर्मनी में उन्होंने Azad Hind Radio से ब्रिटिश विरोधी प्रचार चलाया और यूरोप-एशिया के भारतीय युद्धबंदियों को संगठित किया।
विमान दुर्घटना में निधन
जस्टिस मुखर्जी कमीशन की 2006 की रिपोर्ट के मुताबिक 18 अगस्त, 1945 को ताइवान में कथित विमान दुर्घटना में नेताजी के निधन की खबर आई, लेकिन उनकी मृत्यु पर अब तक रहस्य का पर्दा है। भारत सरकार के तीन आयोगों में से दो ने दुर्घटना में मृत्यु का दावा किया, जबकि तीसरे ने कहा-नेताजी जीवित थ
ब्रिटिश नौकरी से दिया इस्तीफा
दर्शनशास्त्र में स्नातक (1918), ICS परीक्षा (1919) में टॉप रैंकर्स में शामिल, लेकिन 1921 में ब्रिटिश नौकरी से इस्तीफा। यह निर्णय उनके अदम्य स्वाभिमान और देशभक्ति का प्रमाण था। उनके प्रमुख नारे “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा”, और “जब हम खड़े होते हैं, तो आज़ाद हिंद फौज को ग्रेनाइट की दीवार की तरह होना चाहिए।”, तो वहीं “एक व्यक्ति मर सकता है, लेकिन उसका विचार अमर रहता है।”उनकी जयंती को 2021 में भारत सरकार ने ‘पराक्रम दिवस’ के रूप में मनाने की घोषणा की। यह उनके साहस और अदम्य संकल्प को श्रद्धांजलि है।
