ख़िलाफ़त आंदोलन के नायक, भारत की मिट्टी नसीब न हुई, मगर इतिहास में हमेशा जिंदा जौहर
लेखक
मुहम्मद साजिद
मौलाना मुहम्मद अली जौहर, वो नाम जो अंग्रेज़ों के ज़ुल्म सहते-सहते भी अपनी क़लम और आवाज़ से हुकूमत-ए-ब्रिटानिया को हिला दिया। 10 दिसम्बर 1878 को रामपुर में जन्मा ये शख़्स महज़ एक पत्रकार या तालीमयाफ़्ता नहीं, बल्कि हिंदुस्तान की रूह में गूंजने वाली आज़ादी की पुकार था। जौहर ने कॉमरेड और हमदर्द जैसे अख़बारों से सिर्फ़ हिंदुस्तान ही नहीं, बल्कि फ़िलिस्तीन और पूरी मुस्लिम उम्मत की आवाज़ बुलंद की। बाल्फ़ोर डिक्लेरेशन (1917) के बाद उनका कलम ज़ायोनिस्ट साज़िशों के ख़िलाफ़ आग बरसाता रहा। यही वजह थी कि ब्रिटिश सरकार उन्हें सबसे बड़ा ख़तरा समझती थी।
महात्मा गांधी का जीता दिल
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ख़िलाफ़त मूवमेंट में उन्होंने महात्मा गांधी का ऐतबार (भरोसा) जीता और हिंदू -मुस्लिम इत्तेहाद की मिसाल पेश की। जेल की सलाख़ों के पीछे रहते हुए भी उनकी कलम बंद न हुई। 1903 में उन्होंने जेल से लिखा “या तो मुझे आज़ादी दो या दो गज़ ज़मीन।” 1930 में, बीमार होते हुए भी, वे लंदन गोलमेज़ कॉन्फ्रेंस पहुँचे।
मैं हिंदुस्तान आज़ादी का परवाना लेकर ही लौटूंगा
लंदन में गोलमेज़ कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा कि “मैं हिंदुस्तान तभी लौटूंगा, जब मेरे हाथ में आज़ादी का परवाना होगा। वरना मैं मौत को पसंद करूंगा।”4 जनवरी 1931 को उनका इंतकाल (मृत्यु) हो गई। उनकी चाहत थी कि उन्हें हिंदुस्तान की मिट्टी में दफनाया जाए। मगर, यह नसीब न हुई। मुफ़्ती अमीन अल-हुसैनी की दख़्वास्त पर उन्हें बैतुल मुक़द्दस, मस्जिद-ए-अक्सा के पास दफ़न किया गया।
येरुशलम की गलियों में दो लाख से ज़्यादा लोग जनाज़े में
उनके इंतकाल के बाद बैतुल मुक़द्दस, मस्जिद-ए-अक्सा के पास दफनाया गया था। ऐतिहासिक किताबों के मुताबिक, उस दिन येरुशलम की गलियों में दो लाख से ज़्यादा लोग उनके जनाज़े में शामिल हुए। मौलाना मोहम्मद अली जौहर आज भी इतिहास की उन शख्सियतों में शामिल हैं। जिन्होंने न सिर्फ़ आज़ादी का सपना देखा, बल्कि उसे जिया और मिट्टी में समा गए।
अली ब्रदर्स, और बी अम्माँ का जंग- ए-आजादी में योगदान
मौलाना मोहम्मद अली जौहर सिर्फ़ अकेले सिपाही नहीं थे, बल्कि उनका पूरा खानदान भाई शौकत अली और मां बी अम्माँ भी आज़ादी की लड़ाई में शामिल रहे। यही वजह है कि इतिहास उन्हें “अली ब्रदर्स और बी अम्माँ का परिवार” कहकर याद करता है। जिसने अंग्रेज़ों के खिलाफ़ हिंदुस्तान को एक नई ताक़त दी।
बेटों के जेल जाने के बाद “बी अम्माँ”ने संभाली जंग-ए-आजादी की कमान
मौलाना मोहम्मद अली जौहर की माँ आबादी बेगम को “बी अम्माँ” के नाम से जानते थे। वो पर्दानशीन औरत थीं, लेकिन बेटों की गिरफ़्तारी और आज़ादी की जंग ने उन्हें घर की दीवारों से बाहर ला दिया। 1919 में जब मौलाना जौहर और मौलाना शौकत अली जेल में थे, तो बी अम्माँ ने खिलाफ़त और असहयोग आंदोलन की कमान संभाली। बड़े -बड़े जलसों में उन्होंने तकरीरें कीं। उनका सबसे मशहूर जुमला था “मेरे बेटे जेल गए हैं, ताकि हिंदुस्तान आज़ाद हो। अगर, ज़रूरत पड़ी तो मैं अपने बाकी बेटों को भी क़ुर्बान कर दूँगी।”उन्होंने अपने गहने भी आंदोलन के लिए दान कर दिए। बी अम्माँ को आजादी की लड़ाई की पहली औरत क्रांतिकारी नेताओं में शुमार किया जाता है।
अली ब्रदर्स के नाम से मशहूर
मौलाना शौकत अली जौहर भी जंग ए आजादी के नायक हैं। वह मोहम्मद अली जौहर के बड़े भाई थे, और दोनों भाई मिलकर अली ब्रदर्स के नाम से मशहूर हुए। उन्होंने खिलाफ़त आंदोलन और कांग्रेस के साथ मिलकर हिंदू-मुस्लिम एकता की नींव मजबूत की। मौलाना शौकत अली ने महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन को पूरी तरह समर्थन दिया। उन्हें भी कई बार जेल जाना पड़ा। उनकी तक़रीरें युवाओं को जोश से भर देती थीं। उनका मशहूर नारा था “सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है…” की तर्ज़ पर उन्होंने मुसलमानों और हिंदुओं दोनों को आज़ादी की जंग के लिए एकजुट किया।
यूनिवर्सिटी जौहर का सपना
यूपी के रामपुर जिले में मोहम्मद अली जौहर के नाम से जौहर यूनिवर्सिटी स्थापित की गई। इस यूनिवर्सिटी को “जौहर का सपना” कहा जाता है। क्योंकि, मुहम्मद आज़म खान ने इसे अपने राजनीतिक करियर की सबसे बड़ी उपलब्धि बताया था। हालांकि, समय-समय पर इस यूनिवर्सिटी को लेकर कई विवाद और कानूनी मसले भी सामने आते रहे हैं। इसकी नींव 2006 में सपा की सरकार में रखी गई थी। समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री आजम खान ने बुनियाद रखी। इस यूनिवर्सिटी का नाम महान स्वतंत्रता सेनानी, पत्रकार, और खिलाफ़त आंदोलन के नेता मौलाना मोहम्मद अली जौहर के नाम पर रखा गया। इसमें आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ उर्दू, फारसी और इस्लामिक स्टडीज़ पर भी विशेष ध्यान दिया गया था।क़ानून, इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट, एजुकेशन, मेडिकल और ह्यूमैनिटीज़ जैसे कई विभाग इसमें संचालित होते थे। मगर, वर्तमान में यूनिवर्सिटी के संस्थापक पूर्व मंत्री मुहम्मद आजम खां जेल में हैं। रामपुर के लोगों का दबीं जुंबा से कहना है, उनके खिलाफ यह कार्रवाई यूनिवर्सिटी की स्थापना की वजह से ही हुई है।
