अल्लामा फज़ले हक का वो फतवा जिसने अंग्रेजों की नींव हिला दी, काला पानी की सजा भी रोक न सकी आज़ादी का जज़्बा
लेखक मुहम्मद साजिद
इतिहास के वो सुनहरे, और साथ ही खून से लथपथ पन्ने हमें बार-बार ये एहसास दिलाते हैं कि आज़ादी का रास्ता कितना कठिन रहा है। ऐसे ही एक बेमिसाल शख्सियत थे अल्लामा फज़ले हक खैराबादी, जिनका नाम सुनते ही दिल में जुनून और इंक़लाब की आग सुलग उठती है। ये वो रहनुमा थे, जिन्होंने अंग्रेजों की जुल्मों की दीवारें हिला दीं, और पूरे हिन्दुस्तान में एक ऐसा पैग़ाम फैलाया कि लोग हक और आज़ादी के लिए खड़े हो गए। अल्लामा फज़ले हक का जन्म 20 जुलाई 1797 को उत्तर प्रदेश के सीतापुर ज़िले के खैराबाद में हुआ। वो तर्कशास्त्र के माहिर, उर्दू-फारसी-अरबी के बड़े आलिम और शायर थे। पहले ब्रिटिश हुकूमत में नौकरी की लेकिन जब अंग्रेजों का असली चेहरा सामने आया, तो उन्होंने नौकरी छोड़कर मुग़ल दरबार में काम शुरू किया। फिर 1857 में जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने हिंदुस्तान की रूह को लहूलुहान कर दिया, तब अल्लामा ने बेबाक होकर अंग्रेजों के खिलाफ फतवा जारी कर दिया “अंग्रेजों का देश में रहना हराम है। उन्हें बाहर निकाला जाए।”
धार्मिक आदेश नहीं, अंग्रेजों के खिलाफ बगावत
अल्लामा फज़ले हक खैराबादी का यह फतवा सिर्फ एक धार्मिक आदेश नहीं था, बल्कि वो बगावत का बिगुल था। मेरठ से लेकर दिल्ली तक, हर शहर में इसका असर दिखा। मुसलमानों में जोश पैदा हुआ। हिंदू-मुस्लिम एकजुट होकर अंग्रेजों के खिलाफ उठ खड़े हुए। अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार किया, और अदालत में फतवा वापस लेने का लालच दिया। लेकिन अल्लामा ने कहा “मौत को गले लगाना बेहतर है।” उन्हें काला पानी की सजा दी गई। जेल में उन्हें कब्र भी नहीं मिली, बल्कि पत्थरों के नीचे दफन कर दिया गया। फिर भी उनके इरादे टूटे नहीं।
फतवा आजादी की लड़ाई का नारा
उनकी किताबें आज भी दुनिया भर के विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती हैं। उनका फतवा सिर्फ एक दस्तावेज़ नहीं था, बल्कि वो आज़ादी की लड़ाई का नारा था। उनका इंतकाल 19 अगस्त 1861 को हुआ लेकिन उनका नाम आज भी हर उस दिल में ज़िंदा है, जो इंसाफ़ और आज़ादी के लिए लड़ता है। आज जब हम अपने देश की आज़ादी को याद करते हैं, तो अल्लामा फज़ले हक जैसे बहादुरों का जिक्र ज़रूर करना चाहिए। जिन्होंने जान की परवाह किए बिना अंग्रेजों का डटकर मुकाबला किया। ये कहानी सिर्फ अतीत नहीं, बल्कि आज भी हमें प्रेरणा देती है कि ज़ुल्म के खिलाफ आवाज़ उठाना हर इंसान का फ़र्ज़ है।
