लेखक
मुहम्मद साजिद
आज़ादी की लड़ाई के इतिहास में अगर किसी ने बुर्के के पीछे से क्रांति की मशाल जलाई, तो वो थीं आबादी बानो बेगम “बी अम्मा”, 1850 में उत्तर प्रदेश के रामपुर में जन्मी, कम उम्र में विधवा हुईं, लेकिन मातृत्व और देशभक्ति के जज़्बे से उन्होंने इतिहास रच दिया। उस दौर में अंग्रेज़ी पढ़ना “काफ़िरों की भाषा” माना जाता था, मगर बी अम्मा ने समाज के ताने और विरोध के बावजूद अपने बेटों (अली ब्रदर्स) को अंग्रेज़ी स्कूल भेजा। गहने बेचकर पढ़ाया, और उनके बेटे मौलाना मोहम्मद अली जौहर और शौकत अली आगे चलकर ख़िलाफ़त और असहयोग आंदोलन के अग्रदूत बने।
लाठी टेकते मंच पर चढ़ी, और गरजी
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1917 का वो दिन, जब रामपुर की गलियों में अफवाह फैली कि अली ब्रदर्स को गिरफ़्तार कर लिया गया है। भीड़ मायूस थी, तभी बुर्का पहनी एक बुज़ुर्ग महिला लाठी टेकते मंच पर चढ़ी और गरजी, बोलीं – “अगर मेरे बेटे जेल में हैं तो क्या हुआ? क्या तुम्हारे दिलों में भी हिम्मत कैद हो गई?”। ये आवाज़ सिर्फ़ एक मां की नहीं, बल्कि एक पूरी कौम की आवाज़ बन गई।
भाषणों ने महिलाओं में जलाई क्रांति की अलख
बी अम्मा के भाषणों ने हज़ारों औरतों को घर की चारदीवारी से निकालकर आज़ादी की लड़ाई में झोंक दिया।उनका बुर्का हिजाब से बढ़कर इंक़लाब का प्रतीक बन गया। गांधीजी से लेकर सरोजिनी नायडू तक, सबने माना कि बी अम्मा की आवाज़ ने हिंदू-मुस्लिम एकता को मजबूत किया। वो अक्सर कहतीं थीं। हिंदू और मुसलमान, भारत की दो आंखें हैं, अगर एक को चोट लगेगी, तो दूसरे को भी अंधेरा दिखेगा।
पहली महिला स्वतंत्रता सेनानी ने विदेशी कपड़े जलाओ का दिया नारा
उन्होंने ख़िलाफ़त आंदोलन, स्वदेशी अभियान, और असहयोग आंदोलन में महिलाओं को सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित किया। “विदेशी कपड़े जलाओ, स्वदेशी अपनाओ, गुलामी की जंजीरें तोड़ो”, ये उनके भाषणों का स्थायी हिस्सा था। इतिहासकार इफ्तिख़ार आलम ख़ान और महफ़ूज़ुर्रहमान के अनुसार, बी अम्मा भारत की पहली मुस्लिम महिला स्वतंत्रता सेनानी थीं। जिन्होंने सार्वजनिक मंचों पर बुर्का पहनकर जोशीले भाषण दिए।
साहस उम्र में नहीं दिल होता
उनका संघर्ष सिर्फ़ आज़ादी के लिए नहीं था, बल्कि औरतों की आवाज़ को बुलंद करने के लिए भी था। वो कहतीं – साहस उम्र में नहीं, दिल में होता है। अगर, एक मां अपने बेटे के लिए खड़ी हो सकती है, तो पूरे मुल्क के लिए क्यों नहीं?
क्रांति का चेहरा सिर्फ़ तलवार या बंदूक नहीं, एक मां की डगमगाती लाठी
1924 में बीमारी के चलते उनका इंतकाल हो गया, लेकिन उनके शब्द और उनकी हिम्मत आज भी ज़िंदा हैं। बी अम्मा ने साबित कर दिया कि क्रांति का चेहरा सिर्फ़ तलवार या बंदूक नहीं, एक मां की डगमगाती लाठी भी हो सकती है।
