घायल के इलाज में नहीं होनी चाहिए देरी, सरकारी और निजी अस्पतालों को तत्काल शुरू करनी होगी आपातकालीन चिकित्सा
लखनऊ: सड़क हादसों में घायल लोगों के इलाज को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने सख्त टिप्पणी की है। अदालत ने कहा है कि दुर्घटना में घायल किसी व्यक्ति का उपचार पुलिस प्रक्रिया या मेडिको-लीगल औपचारिकताओं के नाम पर रोका नहीं जा सकता। डॉक्टर और चिकित्सा संस्थानों का प्राथमिक दायित्व घायल व्यक्ति को तत्काल चिकित्सीय सहायता उपलब्ध कराकर उसकी जान बचाना है।
25 साल पुराने मामले में कोर्ट ने जताई नाराजगी
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ अंजू प्रकाश श्रीवास्तव की ओर से वर्ष 2000 में दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर नाराजगी जताई कि मामले में करीब 25 साल तक राज्य सरकार की ओर से संतोषजनक जवाब दाखिल नहीं किया गया। अदालत ने सरकार की ओर से हुई देरी पर 25 हजार रुपये का हर्जाना लगाया है। यह राशि सीधे याचिकाकर्ता को दिए जाने का निर्देश दिया गया है। मामले की अगली सुनवाई के लिए 1 अक्टूबर की तारीख तय की गई है।
सरकारी हो या निजी अस्पताल, तत्काल देना होगा इलाज
लखनऊ खंडपीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि चिकित्सा पेशे से जुड़े व्यक्ति का सबसे पहला दायित्व मरीज की जान बचाना है। सड़क दुर्घटना में घायल व्यक्ति सरकारी अस्पताल पहुंचे या निजी अस्पताल अथवा नर्सिंग होम में, उसकी आपातकालीन चिकित्सा को कागजी कार्रवाई के इंतजार में नहीं रोका जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि पुलिसिया कार्रवाई या अन्य कानूनी औपचारिकताओं के कारण घायल को तत्काल चिकित्सा सहायता से वंचित करना उचित नहीं है। आपात स्थिति में डॉक्टरों और चिकित्सा संस्थानों को प्राथमिकता के आधार पर उपचार शुरू करना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले और गुड समैरिटन दिशा-निर्देशों का दिया हवाला
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2016 के ‘सेव लाइफ फाउंडेशन’ फैसले और केंद्र सरकार के वर्ष 2015 के ‘गुड समैरिटन दिशा-निर्देशों’ का हवाला दिया गया। इन प्रावधानों के तहत सड़क हादसे में घायल व्यक्ति को आपातकालीन चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने पर जोर दिया गया है। अदालत के समक्ष यह भी रखा गया कि आपात स्थिति में घायल को इलाज देने से इनकार करना गंभीर पेशेवर कदाचार की श्रेणी में आ सकता है।
सरकार से पूछा- निगरानी के लिए क्या व्यवस्था बनाई गई?
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से यह बताने को कहा है कि इन नियमों और दिशा-निर्देशों का प्रदेश में जमीनी स्तर पर पालन सुनिश्चित करने के लिए क्या ठोस व्यवस्था बनाई गई है। अदालत ने सरकार से अनुपालन और निगरानी की व्यवस्था का पूरा ब्योरा अगली सुनवाई तक प्रस्तुत करने को कहा है। अब इस मामले में 1 अक्टूबर को होने वाली सुनवाई में सरकार की ओर से यह जानकारी अदालत के सामने रखी जाएगी।
घायल की जान बचाना प्राथमिक दायित्व
हाईकोर्ट की टिप्पणी का मुख्य जोर इस बात पर है कि सड़क दुर्घटना में घायल व्यक्ति के लिए शुरुआती समय बेहद महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में उपचार शुरू करने में पुलिस प्रक्रिया, कागजी औपचारिकताओं या अन्य प्रशासनिक कारणों से अनावश्यक देरी नहीं होनी चाहिए। अदालत ने चिकित्सा संस्थानों और संबंधित व्यवस्था की जवाबदेही पर जोर देते हुए सरकार से यह भी स्पष्ट करने को कहा है कि मौजूदा दिशा-निर्देशों के पालन की निगरानी किस तरह की जा रही है।
