भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का ज़िक्र आते ही अक्सर महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, मौलाना आज़ाद या मोहम्मद अली जौहर जैसे नाम सामने आते हैं, लेकिन इस आंदोलन की रीढ़ बनने वाली महिला नेताओं को इतिहास ने उतना स्थान नहीं दिया जितना उनकी कुर्बानियां हैं। ऐसी ही एक नाम अमजदी बानो बेगम का, जो न केवल मोहम्मद अली जौहर की पत्नी (जीवनसंगिनी) थीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम, खिलाफत आंदोलन और महिला शिक्षा की अग्रदूत भी थीं।
ब्रिटिश सरकार के गृह सदस्य मैल्कम हैली ने की तारीफ
ब्रिटिश सरकार के गृह सदस्य मैल्कम हैली ने स्वयं 1920 के दशक में माना था कि असहयोग और खिलाफत आंदोलनों के पीछे अमजदी बेगम, और उनकी सास आबादी बानो की प्रेरक भूमिका थी। यह टिप्पणी साबित करती है कि उनका योगदान कितना निर्णायक था। अमजदी बेगम ने अलीगढ़ महिला कॉलेज की सह-स्थापना की और मुस्लिम समाज में महिलाओं के लिए शिक्षा का द्वार खोला। उन्होंने रूढ़िवादी सोच को चुनौती दी और माना कि शिक्षित महिलाएं ही राष्ट्र और समाज के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभा सकती हैं। विवाह, उत्तराधिकार और तलाक़ जैसे संवेदनशील मुद्दों पर उन्होंने महिलाओं के अधिकारों की खुलकर वकालत की।
गांधी, और खिलाफत आंदोलन में केंद्रीय भूमिका
महात्मा गांधी के तिलक स्वराज कोष और खिलाफत आंदोलन के लिए करोड़ों रुपये जुटाने में उनका योगदान ऐतिहासिक है। गांधी ने स्वयं लिखा कि यह ‘बहादुर महिला’ पूरे देश में धन संग्रह अभियानों का नेतृत्व करती थीं। उनकी अपील इतनी प्रभावशाली थी कि लोग उन्हें विशेष रूप से आमंत्रित करते थे। 14 सितंबर 1921 को जब मोहम्मद अली गिरफ्तार हुए, तब अमजदी बेगम ने घूँघट उठाकर पूरे आंदोलन की बागडोर अपने हाथ में ले ली। उन्होंने जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्रों को प्रेरित किया और कांग्रेस अधिवेशनों में संयुक्त प्रांत का प्रतिनिधित्व किया।
प्यार, साहचर्य और नेतृत्व का संगम
अब्दुल मजीद दरियाबादी के शब्दों में, अमजदी और मोहम्मद अली जौहर का रिश्ता “उन्स” यानी ऐसा प्रेम था जो शांति और स्थिरता देता है। मोहम्मद अली ने भी उन्हें अपनी सहचरी, सहयोगी और मित्र बताया। 1930 में गंभीर बीमारी के बावजूद मोहम्मद अली ने कहा, “मैं बेगम को साथ लिए बिना लंदन गोलमेज सम्मेलन में नहीं जा सकता।” यह बताता है कि अमजदी केवल जीवनसंगिनी नहीं, बल्कि बराबरी की भागीदार थीं।
विरासत जो आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती है
1931 में मोहम्मद अली के निधन के बाद भी अमजदी बेगम का संघर्ष रुका नहीं। मार्च 1947 तक वह मुस्लिम राजनीति, शिक्षा और सामाजिक सुधार की केंद्रीय आवाज बनी रहीं। महिला नेतृत्व केवल सहायक नहीं, बल्कि स्वतंत्र रूप से भी इतिहास रच सकता है।
