किताब बेचने वाले 1857 के गुमनाम हीरो ने ब्रिटिश हुकूमत को दहला दिया
जब हम मुल्क की आज़ादी की जंग के हीरोज़ की बात करते हैं, तो हमारे जहन में चंद नाम नाम आते हैं। लेकिन, दोस्तों… बहुत से ऐसे सपूत हैं जिनका नाम इतिहास के पन्नों से ग़ायब कर दिया गया। उन्हीं में से एक थे शहीद मौलाना पीर अली ख़ान, जिनका नाम सुनते ही अंग्रेज़ अफ़सरों के रौंगटे खड़े हो जाते थे।
किताबों से फैलाया क्रांति का जज़्बा
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1812 में यूपी के आज़मगढ़ में पैदा हुए पीर अली सिर्फ़ 7 साल की उम्र में घर छोड़कर पटना चले आए। वहाँ उन्होंने किताबों की दुकान खोली, लेकिन यह दुकान किताबों का ही अड्डा नहीं, बल्कि क्रांति का गुप्त दरबार बन गई। क्रांतिकारी साहित्य, पर्चे और आज़ादी की बातें- सब वहीं से फैलते। 1857 की क्रांति के दौरान जब पटना में बगावत भड़की, अंग्रेज़ अफ़सरों पर हमला हुआ और डॉ. लायल मारा गया- तब पीर अली और उनके साथी अंग्रेज़ों के निशाने पर आ गए।
नाम सुनकर थरथर कांपते थे अंग्रेज़ अफ़सर
मौलाना पीर अली खां के नाम से ब्रिटिश हुकूमत के अफसर थरथर कांपते थे। उनको 5 जुलाई 1857 को गिरफ्तार कर लिया गया। विलियम टेलर (तत्कालीन अंग्रेज़ कमिश्नर) ने उन्हें सौदा ऑफ़र किया- “साथियों का नाम बता दो, जान बख़्श देंगे।” लेकिन पीर अली का जवाब था,“तुम चाहो तो आज मुझे फांसी पर चढ़ा दो… मगर, मेरे बाद हज़ारों अली पैदा होंगे, जो तुम्हारे तख़्तो-ताज को जला देंगे।” 7 जुलाई 1857 को पटना में बिना मुक़दमा चलाए, अंग्रेज़ों ने सरेआम उन्हें फांसी पर लटका दिया। आज वही जगह शहीद पीर अली ख़ान पार्क के नाम से उनकी कुर्बानी की गवाही देती है।
