1857 की क्रांति भारत की आज़ादी की पहली बिगुल थी, और इस बिगुल की एक गूंज उठी थी, बरेली की नौमहला मस्जिद से, यहां सिर्फ नमाज़ नहीं पढ़ी जा रही थी… बल्कि आज़ादी की रणनीति बुनी जा रही थी। नौमहला मस्जिद, बरेली के उसी ऐतिहासिक मुहल्ले में स्थित है। जिसे 1749 में रुहेला सरदार हाफिज रहमत खान ने बसाया था। ये मस्जिद उस दौर में क्रांतिकारियों का गढ़ बन चुकी थी। इबादत के साथ यहाँ इंकलाब की बुनियाद डाली जा रही थी, जब 22 मई 1857 को ईद-उल-अलविदा की नमाज़ के लिए भीड़ उमड़ी, तो छावनी के सिपाही, बरेली कॉलेज के शिक्षक-छात्र और आम लोग, सब एक साथ थे। उस वक्त मौलवी महमूद हसन ने मस्जिद से जो तकरीर दी, वो इतिहास की दिशा मोड़ने वाली थी। उन्होंने साफ कहा “अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ उठ खड़े होना गुनाह नहीं, फ़र्ज़ है।”
नौमहला बगावत की चिंगारी का केंद्र
अंग्रेजों को अंदेशा था कि नौमहला ही बगावत की चिंगारी का केंद्र है। कोतवाल बदरुद्दीन को खास निगरानी के आदेश मिले थे। मस्जिद की हर हरकत पर नज़र रखी जा रही थी, लेकिन मौलवी हसन की हुंकार रोक पाना अंग्रेजों के बस में न था। इसके बाद में जब अंग्रेज नकटिया के युद्ध में जीत के बाद शहर में दाखिल हुए, तो उन्होंने नौमहला को खास निशाना बनाया। इमारतें जलाई गईं, मस्जिद को लूटा गया, और अजान देते वक्त इस्माईल शाह को शहीद कर दिया गया। यह केवल एक मस्जिद नहीं थी। यह आज़ादी का मीनार थी।
