संजीव मेहरोत्रा
महामंत्री
बरेली ट्रेड यूनियंस फेडरेशन
वित्तीय वर्ष 2023-24 के आंकड़े भारत की आर्थिक सेहत को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। घरेलू बचत दर गिरकर GDP के मात्र 18.1% पर पहुंच गई है, जो बीते पांच वर्षों का न्यूनतम स्तर है। वहीं दूसरी ओर, घरेलू वित्तीय देनदारियां GDP के 6.2% तक जा पहुंची हैं, जो बीते दशक की सबसे ऊंची स्थिति है। सरकार द्वारा राज्यसभा में दिए गए आंकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि भारतीय परिवार कर्ज के जाल में तेजी से उलझ रहे हैं। चाहे वो घर खरीदने का सपना हो या गाड़ी लेने की मजबूरी, बढ़ते ब्याज दरों और EMI के दबाव ने पारंपरिक बचत की संस्कृति को प्रभावित किया है।
घटती बचत के पीछे के मुख्य कारण
उन्होंने बताया कि आवास और वाहन ऋण पर ऊंची ब्याज दरें मुख्य कारण हैं। इसके साथ ही NBFCs और बैंकों द्वारा बढ़ते क्रेडिट लोन, लोगों का रुझान वित्तीय बचत से हटकर रियल एसेट में निवेश की ओर, भारत की घरेलू बचत दर 2011-12 में 34.6% थी, जो अब गिरकर 18.1% रह गई है। वहीं, 2022-23 में यह 29.7% थी, जो 40 वर्षों में सबसे निचला स्तर था।
ग्रामीण भारत की स्थिति
एक रोशनी की किरण यह है कि ग्रामीण भारत में मजदूरी दर, खासतौर पर पुरुष श्रमिकों की, मुद्रास्फीति से ऊपर है। इससे कुछ राहत की उम्मीद है। लेकिन क्या यह बढ़ती कर्ज संस्कृति की भरपाई कर पाएगा?
क्या होनी चाहिए नीति?
सरकार को क्रेडिट व्यवस्था पर मजबूत नियंत्रण रखते हुए, लोगों को वित्तीय रूप से साक्षर बनाने की दिशा में तेजी से काम करना होगा। युवाओं को बचत योजनाओं में जोड़ने के लिए डिजिटल वित्तीय जागरूकता अभियान चलाने होंगे।
